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ऐ शकीबे जां मुज़्तर रहमतुल लिल आलमीन

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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ऐ शकीबे जां मुज़्तर रहमतुल लिल आलमीन रहम शुस्तर बंदा परवर रहमतुल लिल आलमीन ऐ के नूरत माहे परवर रहमतुल लिल आलमीन बर दरे तू मेहरे चाकर रहमतुल लिल आलमीन मन रानी कद रा अल-हक सत फरमाने शुमा काश बीनीम रुए अनवर रहमतुल लिल आलमीन अज़ सुमोमे रंजो ग़म बम-ओ-अलम मन सोख्तम शुद दिले मन मिस्ले अंगर रहमतुल लिल आलमीन क़तरा ज़ आबे करम काफ़ीत यक क़तरा बदेह चूं दिले दारम जू मुजमर रहमतुल लिल आलमीन तीरा-ओ-तार सत शा में मा ग़रीबां सुब्ह कुन आफ़ताबे ज़र्रा परवर रहमतुल लिल आलमीन गर जमाल-ए-अहमदी ख़ाही दर असहाबिश बिबीं आंचनां कानवारे हक दर रहमतुल लिल आलमीन ओस्त गर रब्बे जहां ईनस्त रहमत-ए-ख़ल्क़ रा रहमत-ओ-सलावाते हक बर रहमतुल लिल आलमीन चूं बर आरम सर ज़ गोरे ख़ुद बीनीम रुए ऊ चश्मे बादा या ख़ुदा बर रहमतुल लिल आलमीन दामने अहमद रज़ा ख़ान दाद दर दस्ते फ़कीर जाने मा बादा फ़िदा बर रहमतुल लिल आलमीन मन जमीलम मुज़तरम बर दरगहे तू हासिरम रहम कुन बर हाले मुज़्तर रहमतुल लिल आलमीन