ऐज़ां बराय-ए-क़ियाम

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

100%
मोमिन-ओ-वक़्त-ए-अदब है आमद-ए-महबूब-ए-रब है जाए आदाब-ओ-तरब है आमद-ए-शाह-ए-अरब है ग़ुंचे चटके फूल महके शाख-ए-गुल पर मुर्ग़ चहके रोता है शैतान ये कह के आमद-ए-शाह-ए-अरब है ख्वाहिश-ए-ज़ुल्फ़-ए-नबी में मस्त हैं गुल की शमीमें झूम कर आईं नसीम आमद-ए-शाह-ए-अरब है बुदलियां रहमत की छाएं बूंदें रहमत की आएं अब मुरादें दिल की पाएं आमद-ए-शाह-ए-अरब है बज रहे हैं शादियां ने बुत लगे कलमा सुनाने हर ज़बान पे हैं तराने आमद-ए-शाह-ए-अरब है अब्र-ए-रहमत छा गया है काबे पे झंडा गड़ा है बाब-ए-रहमत आज वा है आमद-ए-शाह-ए-अरब है क़स्र-ए-किसरा कांपता है ख़ुश्क सावा हो गया है हर तरफ से ये सदा है आमद-ए-शाह-ए-अरब है आता है वो माह-ए-लिक़ा है जिस पे प्यारा किबरिया है दो जहां में ग़ुलग़ुला है आमद-ए-शाह-ए-अरब है आने वाला है वो प्यारा दोनों आलम का सहारा काबे का चमका सितारा आमद-ए-शाह-ए-अरब है आता है शाह-ए-हुकूमत फ़र्ज़ है जिस की इताअत हर नबी ने दी बशारत आमद-ए-शाह-ए-अरब है होने वाली वो सहर है जो सहर रश्क-ए-क़मर है मुक़द्दम-ए-ख़ैरुल बशर है आमद-ए-शाह-ए-अरब है उठो आया ताज वाला अर्श की आंखों का तारा सब कहो ऐ माह-ए-तैयबा सलातुल्लाहि अलैका