Home/Mustafa Raza Khan Qadri/Fauj-e-Gham Ki Barabar Charhai Hai

Fauj-e-Gham Ki Barabar Charhai Hai

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

100%
फ़ौज-ए-ग़म की बराबर चढ़ाई है दाफ़-ए-ग़म तुम्हारी दुहाई है उम्र खेलों में हम ने गंवाई है उम्र भर की यही तो कमाई है तुम ने कब बात कोई निभाई है तुम से जो आरज़ू की बर आई है तुम से हर दम उम्मीद भुलाई है मिट सके जो हम में बुराई है तुम ने कब आंख हम को दिखाई है तुम ने कब आंख हम से फिराई है तुम को आलम का मालिक किया उस ने जिस की ममलुक सारी खुदाई है किस के क़ब्ज़े में हैं ये ज़मीन-ओ-ज़मां किस के क़ब्ज़े में प्यारे खुदाई है तू ख़ुदा का हुआ और ख़ुदा तेरा तेरे क़ब्ज़े में सारी खुदाई है जब ख़ुदा ख़ुद तुम्हारा हुआ तो फिर कौन सी चीज़ है जो पराई है सब सिफ़ात-ए-ख़ुदा के हो तुम मज़हर एक क़ाबू से बाहर खुदाई है ताज रखा तेरे सर रफ़अना का किस क़द्र तेरी इज़्ज़त बढ़ाई है अंबिया को रसाई मिली तुम तक बस तुम्हारी ख़ुदा तक रसाई है अज़ ज़मीं ता फ़लक जिन-ओ-इन्स-ओ-मलक जिस को देखो तुम्हारा फ़दाई है रश्क-ए-सुलतान है वो गदा जिस ने तेरे कूचा में धूनी रमाई है मेरी तक़दीर कर दो भली तुम ने क़ुदरत-ए-मह्व-ओ-इसबात पाई है मेरा बेड़ा किनारे लगे प्यारे नूह की नाव किस ने तरायी है आग को बाग किस ने किया प्यारे तुम ने तुम ने ही क़ुदरत ये पायी है मेरे दिल की लगी भी बुझा दीजे नारे नमरूद किस ने बुझायी है शरर अफ़शानियां किस की हैं इश्क़ की आग सीने में जिस ने लगायी है काश वो हश्र के दिन कहें मुझ से नारे दोज़ख़ से तुझ को रिहाई है खुशबूए ज़ुल्फ़ से कूचे महके हैं कैसे फूलों में शाहा बसाई है प्यारे खुशबू तुम्हारे पसीने की ख़ुल्द के फूलों से भी सवाई है बात वो अत्र-ए-फ़िरदौस में भी नहीं तेरे मलबूस ने जो सुंघायी है इस रज़ा पर हो मौला रज़ाये हक़ राह जिस ने तुम्हारी चलायी है नाख़ुदा बाख़ुदा आओ बहर-ए-ख़ुदा मेरी कश्ती तबाही में आयी है हैं ये सदमे तरी ही फ़ुर्क़त के रोज़ अफ़ज़ूँ ये दर्द-ए-जुदाई है तैयबा जाऊँ वहाँ से न वापस आऊँ मेरे जी में तो अब ये समायी है मर रहा हूँ तुम आओ जियूँ में शर्बत-ए-दीद मेरी दवाई है शौक़-ए-दीदार-ए-नूरी में ऐ नूरी रूह खींच कर अब आँखों में आयी है