हदाइक़-ए-बख़्शिश
१३२५ हिजरी
हिस्सा दोम
अला या अय्युहस साक़ी अदि रकासन व नाविल्हा
के बर याद-ए-शिश-ए-कौसर बना साज़िम महफ़िल हा
बला बारीद हुब-ए-शेख़-ए-नज्दी बर वहाबिया
के इश्क़ आसाँ नमूद अव्वल व ले अफ़ताद मुश्किल हा
वहाबी गरचह इख़फ़ा मी कुनंद बुग़्ज़-ए-नबी लेकिन
निहाँ के मानद आँ राज़े के रू साज़ंद महफ़िल हा
तुहुब-गाह-ए-मुल्क-ए-हिंद इक़ामत रा नमी शायद
बजुरस फ़र्याद मी दारद के बर बंदिद महमिल हा
सला-ए-मजलिज़म दर गोश आमद बिया बिशु
जुरस मस्ताना मी गोयद के बर बंदिद महमिल हा
मगर्दां रू अज़ीं महफ़िल रह-ए-अरबाब-ए-सुन्नत रो
के सालिक बे-ख़बर नबूद ज़ी राह ओ रस्म-ए-मंज़िल हा
दर ईं जल्वत बिया अज़ राह-ए-ख़ल्वत ता ख़ुदा याबी
मता मा तलक़ा मन तहवा दइद्दुनया व अमहिलहा
दिलम क़ुर्बानत ऐ दूद-ए-चराग़-ए-महफ़िल-ए-मौलिद
ज़-ताब-ए-जअद-ए-मुश्कीं त चे ख़ूँ अफ़ताद दर दिल हा
ग़रीक़-ए-बहर-ए-इश्क़-ए-अहमदिम अज़ फ़रहत-ए-मौलिद
कजा दानंद हाल-ए-मा सुबकसारां साहिल हा
रज़ा मस्त-ए-जाम-ए-इश्क़ साग़र बाज़ मी ख्वाहद
अला या अय्युहस साक़ी अदि रकासन व नाविल्हा