ख़ाक-ए-पा अक्सीर का भरती है दम
खाता है क़ुरआन भी जिस की क़सम
झोलियां डाले फ़क़ीर ओ बे-नवा
हाथ फैलाए हुए शाह ओ गदा
कर रहे हैं अर्ज़ बा-ज़ौक़ ओ तरब
ऐ मरे मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब
गाह दर दिल साज़ ओ गह दर दीदा जा
हर दो जाए तुश्त या बदरु-दुजा
रो-सियाह ओ बे-कस ओ ख़ाती मनम
चश्म-ए-रहमत बरगुशा आसी मनम
मन नई-अम मुनकिर ख़ता-वार-ए-तो अम
बंद-ए-रुसवा ओ नाकार-ए-तो अम
कारवां रफ़्त ओ परेशानाम बे-कसे
रहम कुन या शाह बर मन बे-कसे