ख़ाक-ए-पा

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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ख़ाक-ए-पा अक्सीर का भरती है दम खाता है क़ुरआन भी जिस की क़सम झोलियां डाले फ़क़ीर ओ बे-नवा हाथ फैलाए हुए शाह ओ गदा कर रहे हैं अर्ज़ बा-ज़ौक़ ओ तरब ऐ मरे मेहर-ए-अजम माह-ए-अरब गाह दर दिल साज़ ओ गह दर दीदा जा हर दो जाए तुश्त या बदरु-दुजा रो-सियाह ओ बे-कस ओ ख़ाती मनम चश्म-ए-रहमत बरगुशा आसी मनम मन नई-अम मुनकिर ख़ता-वार-ए-तो अम बंद-ए-रुसवा ओ नाकार-ए-तो अम कारवां रफ़्त ओ परेशानाम बे-कसे रहम कुन या शाह बर मन बे-कसे