शुक्र तेरा हो सके किस तरह रहमान-ए-रसूल
मुझ से आसी को किया तू ने सनाख़वाने रसूल
या इलाही इश्क़े मौला में मुझे ऐसा गुमा
ता अबद निकले न मेरे दिल से अरमाने रसूल
अम्र उन का अम्रे रब्ब है उन की ही रब्ब
वो है फ़रमाने इलाही जो है फ़रमाने रसूल
दो जहां में आफ़ताबे हाश्मी की है ज़िया
आईना हैं हर दो आलम पेशे चश्माने रसूल
हैं मलक रोज़े पे हाज़िर दाबे शाही के लिए
वरना ख़ुद मौला तआला है निगहवाने रसूल