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Woh su-e-lala zaar phirte hain

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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वह सू-ए-लालाज़ार फिरते हैं तेरे दिन ऐ बहार फिरते हैं जो तेरे दर से यार फिरते हैं दर-ब-दर यूँ ही ख़्वार फिरते हैं आह कल ऐश तो किये हम ने आज वह बे-क़रार फिरते हैं इन के ईमा से दोनों बाग़ों पर ख़ैल-ए-लैल-ओ-नहार फिरते हैं हर चराग़-ए-मज़ार पर कुदसी कैसे परवाना-वार फिरते हैं उस गली का गदा हूँ जिस में मांगते ताजदार फिरते हैं जाँ हैं जाँ क्या नज़र आये क्यों अदु गर्द-ए-ग़ार फिरते हैं फूल क्या देखूँ मेरी आंखों में दश्त-ए-तैबा के ख़ार फिरते हैं लाखों क़ुदसी हैं खिदमत पर लाखों गिर्द-ए-मज़ार फिरते हैं वर्दीयां बोलते हैं हरकारे पहरा देते सवार फिरते हैं रखे जैसे हैं ख़ाना ज़ाद हैं हम मोल के ऐब-दार फिरते हैं हाए ग़ाफ़िल वो क्या जगह है जहाँ पाँच जाते हैं चार फिरते हैं बाएँ रस्ते न जा मुसाफ़िर सुन माल है राह-ए-मार फिरते हैं जाग सुनसान बन है रात आई गुर्ग बहर-ए-शिकार फिरते हैं नफ़्स ये कोई चाल है ज़ालिम जैसे खाने ज़ार फिरते हैं कोई क्यों पूछे तेरी बात रज़ा तुझ से कितने हज़ार फिरते हैं