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आंखें रो रो के सजाने वाले

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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आंखें रो रो के सजाने वाले जाने वाले नहीं आने वाले कोई दिन में यह सरा उजड़ है अरे ओ छावनी छाने वाले ज़ब्ह होते हैं वतन से बिछड़े देस क्यों गाते हैं गाने वाले अरे बद फ़ाल बुरी होती है देस का जंगला सुनाने वाले सुन लें अदा में बिगड़ने का नहीं वो सलामत हैं बनाने वाले आंखें कुछ कहती हैं तुझ से पैग़ाम ओ दरे यार के जाने वाले फिर न करवट ली मदीना की तरफ अरे चल झूठे बहाने वाले नफ़्स में ख़ाक हुआ तो न मिटा है मेरी जान के खाने वाले जीते क्या देख के हैं ऐ हूरों तैयबा से ख़ुल्द में आने वाले नीम जलवे में दो आलम गुलज़ार वाह वा रंग ज़माने वाले हुस्न तेरा सा न देखा न सुना कहते हैं अगले ज़माने वाले वही धूम उन की है मा शा अल्लाह मिट गए आप मिटाने वाले लबे सैराब का सदक़ा पानी ऐ लगी दिल की बुझाने वाले साथ ले लो मुझे मैं मुजरिम हूँ राह में पड़े हैं थाने वाले हो गया धक से कलेजा मेरा हाए रुख़सत की सुनाने वाले ख़ल्क़ तो क्या कि हैं ख़ालिक़ को अज़ीज़ कुछ अजब भाते हैं भाने वाले कुश्ताए दश्त-ए-हरम जन्नत की खिड़कियां अपने सरहाने वाले क्यों रज़ा आज गली सूनी है उठ मेरे धूम मचाने वाले