आओ महफिल में गुलामान-ए-रसूल-ए-अरबी
आज है जोश पे फैज़ान-ए-रसूल-ए-अरबी
झूमते फिरते हैं मस्तान-ए-रसूल-ए-अरबी
है महक पर चमनस्तान-ए-रसूल-ए-अरबी
कैसे उश्शाक थे यारान-ए-रसूल-ए-अरबी
अपने सर कर दिए कुर्बान-ए-रसूल-ए-अरबी
ऐसी वुसअत से बिछा ख़्वान-ए-रसूल-ए-अरबी
सारा आलम हुआ मेहमान-ए-रसूल-ए-अरबी
काबा-ओ-अर्ज़-ओ-समा शम्स-ओ-क़मर हूर-ओ-मलक
हैं सभी ताबे-ए-फ़रमान-ए-रसूल-ए-अरबी
हूर-ओ-ग़िलमां की तमन्ना हो न शौक़-ए-जन्नत
जिस ने देखा है बयाबान-ए-रसूल-ए-अरबी
अपनी किस्मत पे न क्यों फ़ख़्र करूं लाखों बार
देखूं जब गुम्बद-ए-ऐवान-ए-रसूल-ए-अरबी
उस ने अल्लाह के जलवों का किया नज़ारा
जिस ने देखा रुख-ए-ताबान-ए-रसूल-ए-अरबी
उन की मदहत नहीं कुछ इन्स-ओ-मलक पर मौकूफ़
ज़र्रा ज़र्रा है सना ख़्वान-ए-रसूल-ए-अरबी
किस को सरकार से नेअमत न मिली कौन है वह
जो नहीं बंदा-ए-एहसान-ए-रसूल-ए-अरबी
रम्ज़-ए-महबूब-ओ-मोहब्बत कौन समझ सकता है
हुक्म-ए-रहमान है फ़रमान-ए-रसूल-ए-अरबी
क़ब्र-ओ-महशर का उन्हें ग़म ही नहीं कुछ असलन
जिन के हाथों में है दामान-ए-रसूल-ए-अरबी
उन का बंदा हुआ अल्लाह का महबूब बना
साफ़ फ़रमाता है क़ुरआन-ए-रसूल-ए-अरबी
तीरह बख़्तों के मुकद्दर को ज़रा चमका दे
ऐ ज़िया-ए-दुर-ए-दंदान-ए-रसूल-ए-अरबी
दीन-ओ-दुनिया की मयस्सर हुई उन को शाही
जो हुए दिल से गदायान-ए-रसूल-ए-अरबी
छोड़ कर सल्तनतें उन के बने ख़ाक नशीं
आफ़रीं बाद फ़कीरान-ए-रसूल-ए-अरबी
रूबरू मिस्ल-ए-कफ़-ए-दस्त हैं दोनों आलम
कैसी पुर-नूर हैं चश्मान-ए-रसूल-ए-अरबी
बाद-ए-हुब्ब-ए-नबी ख़ूब जमाई रंगत
हो गए मस्त गुलामान-ए-रसूल-ए-अरबी
चश्म-ए-दिल गोर-ए-ग़रीबां को मुनव्वर कर दे
मैं फ़िदा शमअ-ए-शबिस्तान-ए-रसूल-ए-अरबी
क़ब्र में जब कि नकीरैन करें मुझ से सवाल
मैं कहूं बंदा-ए-दरबान-ए-रसूल-ए-अरबी
दाखिल-ए-ख़ुल्द किए जाएंगे अह्ल-ए-इंसियां
जोश पर आएगी जब शान-ए-रसूल-ए-अरबी
फ़ातेह-ए-बाब-ए-शफ़ाअत के सबब हुक्म-ए-मिला
जाएं जन्नत में गदायान-ए-रसूल-ए-अरबी
या इलाही यह दुआ है कि बरोज़-ए-महशर
सर पे हो साया-ए-दामान-ए-रसूल-ए-अरबी
ऐ जमील-ए-रज़वी तेरी हकीकत क्या है
जब ख़ुदा ख़ुद है सना ख़्वान-ए-रसूल-ए-अरबी
यह रज़ा का है तसद्दुक़ कि जमील-ए-रज़वी
हुआ मशहूर सना ख़्वान-ए-रसूल-ए-अरबी
हां सुना कोई ग़ज़ल और जमील-ए-रज़वी
कि हैं मुश्ताक मुहिब्बान-ए-रसूल-ए-अरबी