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आओ महफिल में गुलामान-ए-रसूल-ए-अरबी

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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आओ महफिल में गुलामान-ए-रसूल-ए-अरबी आज है जोश पे फैज़ान-ए-रसूल-ए-अरबी झूमते फिरते हैं मस्तान-ए-रसूल-ए-अरबी है महक पर चमनस्तान-ए-रसूल-ए-अरबी कैसे उश्शाक थे यारान-ए-रसूल-ए-अरबी अपने सर कर दिए कुर्बान-ए-रसूल-ए-अरबी ऐसी वुसअत से बिछा ख़्वान-ए-रसूल-ए-अरबी सारा आलम हुआ मेहमान-ए-रसूल-ए-अरबी काबा-ओ-अर्ज़-ओ-समा शम्स-ओ-क़मर हूर-ओ-मलक हैं सभी ताबे-ए-फ़रमान-ए-रसूल-ए-अरबी हूर-ओ-ग़िलमां की तमन्ना हो न शौक़-ए-जन्नत जिस ने देखा है बयाबान-ए-रसूल-ए-अरबी अपनी किस्मत पे न क्यों फ़ख़्र करूं लाखों बार देखूं जब गुम्बद-ए-ऐवान-ए-रसूल-ए-अरबी उस ने अल्लाह के जलवों का किया नज़ारा जिस ने देखा रुख-ए-ताबान-ए-रसूल-ए-अरबी उन की मदहत नहीं कुछ इन्स-ओ-मलक पर मौकूफ़ ज़र्रा ज़र्रा है सना ख़्वान-ए-रसूल-ए-अरबी किस को सरकार से नेअमत न मिली कौन है वह जो नहीं बंदा-ए-एहसान-ए-रसूल-ए-अरबी रम्ज़-ए-महबूब-ओ-मोहब्बत कौन समझ सकता है हुक्म-ए-रहमान है फ़रमान-ए-रसूल-ए-अरबी क़ब्र-ओ-महशर का उन्हें ग़म ही नहीं कुछ असलन जिन के हाथों में है दामान-ए-रसूल-ए-अरबी उन का बंदा हुआ अल्लाह का महबूब बना साफ़ फ़रमाता है क़ुरआन-ए-रसूल-ए-अरबी तीरह बख़्तों के मुकद्दर को ज़रा चमका दे ऐ ज़िया-ए-दुर-ए-दंदान-ए-रसूल-ए-अरबी दीन-ओ-दुनिया की मयस्सर हुई उन को शाही जो हुए दिल से गदायान-ए-रसूल-ए-अरबी छोड़ कर सल्तनतें उन के बने ख़ाक नशीं आफ़रीं बाद फ़कीरान-ए-रसूल-ए-अरबी रूबरू मिस्ल-ए-कफ़-ए-दस्त हैं दोनों आलम कैसी पुर-नूर हैं चश्मान-ए-रसूल-ए-अरबी बाद-ए-हुब्ब-ए-नबी ख़ूब जमाई रंगत हो गए मस्त गुलामान-ए-रसूल-ए-अरबी चश्म-ए-दिल गोर-ए-ग़रीबां को मुनव्वर कर दे मैं फ़िदा शमअ-ए-शबिस्तान-ए-रसूल-ए-अरबी क़ब्र में जब कि नकीरैन करें मुझ से सवाल मैं कहूं बंदा-ए-दरबान-ए-रसूल-ए-अरबी दाखिल-ए-ख़ुल्द किए जाएंगे अह्ल-ए-इंसियां जोश पर आएगी जब शान-ए-रसूल-ए-अरबी फ़ातेह-ए-बाब-ए-शफ़ाअत के सबब हुक्म-ए-मिला जाएं जन्नत में गदायान-ए-रसूल-ए-अरबी या इलाही यह दुआ है कि बरोज़-ए-महशर सर पे हो साया-ए-दामान-ए-रसूल-ए-अरबी ऐ जमील-ए-रज़वी तेरी हकीकत क्या है जब ख़ुदा ख़ुद है सना ख़्वान-ए-रसूल-ए-अरबी यह रज़ा का है तसद्दुक़ कि जमील-ए-रज़वी हुआ मशहूर सना ख़्वान-ए-रसूल-ए-अरबी हां सुना कोई ग़ज़ल और जमील-ए-रज़वी कि हैं मुश्ताक मुहिब्बान-ए-रसूल-ए-अरबी