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अच्छे के प्यारे मेरे सहारे

Written by Allama Hasan Raza Khan

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अच्छे के प्यारे मेरे सहारे बाहर हैं बयां से उन के मनाक़िब वह और शरीयत वह और तरीक़त दो दिल यक आरमाल यक जाँ दो क़ालिब अब्द-ओ-ख़ुदा में मानिंद-ए-बरज़ख मक़्सूद-ओ-क़ासिद मतलूब-ओ-तालिब दरिया-ए-रहमत गुलज़ार-ए-रफ़त जान-ए-मराहिम कान-ए-मवाहिब नज्म-ए-मनाज़िल शम्अ-ए-महफ़िल मेहर-ए-मशारिक माह-ए-मगारिब ख़ल्क़-ए-ख़ुदा के क्यों न हों रहबर हैं मुस्तफ़ा के फ़र्ज़ंद-ओ-नाइब ख़ुद ऐन-ए-नूर सय्यिदी के नूर-ए-ऐन इश्क़ी के दिल के चैन मेरे दर्द की दवा मेरे बुज़ुर्ग भी इसी दर के ग़ुलाम हैं मैं भी कमीना बंदा इसी बारगाह का मा बंदा-ए-क़दीम व तूई ख़्वाजा-ए-करीम परवर्दा-ए-तू-ऐम बफ़ैज़-ए-क़दमा जान-ए-ज़ुहूर अब कोई इख़फ़ा का वक़्त है हाइल जो पर्दा बीच में था वो भी उठ गया असरार का ज़ुहूर हो शान-ए-ज़ुहूर से अस्तार से उठाइए अब पर्दा-ए-ख़फ़ा ऐलान से दिखाइए वो क़ादरी कमाल इज़हार कीजिए शौकत-ए-क़ुदरत का बरमला दरवाज़े खोल दीजिए इमदाद-ए-ग़ैब के कासे लिए खड़े हैं बहुत देर से गदा या सय्यिदी मैं कह के पुकारूँ बला के वक़्त तुम ला तख़फ़ सुनाते हुए आओ सरवरा