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Ae Bayaban-e-Arab teri baharon ko salaam

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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ऐ बयाबान-ए-अरब तेरी बहारों को सलाम तेरे फूलों को तेरे पाकीज़ा खारो को सलाम जबल-ए-नूर-ओ-जबल-ए-सौर और उन के गारो को सलाम नूर बरसाते पहाड़ों की क़तारों को सलाम झूमते हैं मुस्कुराते हैं मुग़ीलाने-अरब ख़ूब सूरत वादियों को रेगज़ारों को सलाम रात दिन रहमत बरसती है जहाँ पर झूम कर उन तवाफ़-ए-काबा के रंगीन नज़ारों को सलाम इश्क़ में दीवार-ए-काबा से जो लिपटे हैं वहाँ उन सभी दीवानों सारे बे-क़रारों को सलाम हजर-ए-अस्वद, बाब-ओ-मीज़ान-ओ-मकाम-ओ-मुल्तज़म और ग़िलाफ़-ए-काबा के रंगीन नज़ारों को सलाम मुस्तजार-ओ-मुस्तजाब-ओ-बिअर-ए-ज़म ज़म और मताफ़ और हतीम-ए-पाक के दोनों किनारों को सलाम रुक्न-ए-शामी-ओ-इराकी-ओ-यमानी को भी और जगमगाते नूर बरसाते मीनारों को सलाम जो मुसलमान ख़ाना-ए-काबा का करते हैं तवाफ़ उन को भी और सारे ही सजदा गुज़ारो को सलाम ख़ूब चूमे हैं क़दम सौर-ओ-हिरा ने शाह के महके महके प्यारे दोनों गारों को सलाम मदनी मुंतों का भी हमला ख़ूब था बोझल पर बद्र के उन दोनों नन्हे जाँ निसारों को सलाम जगमगाते गुंबद-ए-ख़ज़रा पे हो रहमत मुदाम मस्जिद-ए-नबवी के नूरानी मीनारों को सलाम मिंबर-ओ-मेहराब-ए-जाना और सुनहरी जालियाँ सब्ज़ गुंबद के मकीं को दोनों प्यारों को सलाम सय्यदी हमज़ा को और जुमला शहीदान-ए-उहुद को भी और सब ग़ाज़ियों को शहसवारों को सलाम जिस कदर जिन-ओ-बशर में थे सहाबा शाह के सब को भी बेशक ख़ुसूसन चार यारों को सलाम जिस जगह पर आके सोये हैं सहाबा दस हज़ार उस बक़ी-ए-पाक के सारे मज़ारों को सलाम शौक़-ए-दीदार-ए-मदीना में तड़पते हैं जो, उन बे-क़रारों, दिल फ़गारों, अश्कबारों को सलाम ग़ुस्ल-ए-काबा का भी मंज़र किस कदर पुर-कैफ है झूम कर कहता है अत्तार उन नज़ारों को सलाम