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Ae mere bhaiyo sab suno dhar ke kaan aish o ashrat ki ud jayen gi dhajjiyan

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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ऐ मरे भाइयो सब सुनो धर के कान ऐश ओ अशरत की उड़ जाएंगी धज्जियां आख़िरत की करो जल्द तैयारियां मौत आ कर रहे गी तुम्हें बे-गुमां मौत का देखो एलान करता हुआ सोये गोर-ए-ग़रीबां जनाज़ा चला कहता है, जाम-ए-हस्ती को जिस ने पिया वह भी मेरी तरह क़ब्र में जाएगा तुम ऐ बूढ़ो सुनो! नौजवानो सुनो ऐ ज़ईफ़ो सुनो! पहलवानो सुनो! मौत को हर घड़ी सर पे जानो सुनो जल्द तौबा करो मेरी मानो सुनो! जिस का संसार में हो गया है जनम रब की नाराज़ियों से बचे दम ब दम वरना पछताए गा क़ब्र में लाजरम होगा बरज़ख़ में रंज उस को दोज़ख़ में ग़म फ़िल्म बीनी का तुम मश्ग़ला छोड़ दो सारे आलात-ए-लहू ओ लअब तोड़ दो भाइयो! सब गुनाहों से मुंह मोड़ दो नाताए तुम नेकियों ही से बस जोड़ दो एक दिन मौत आ कर रहे गी ज़रूर इस को तुम मुजरिमो कुछ समझना न दूर बाद मुर्दन न पाओ गे कोई सुरूर ऐसे हो जाए गा ख़ाक सारा ग़रूर (मदीना) १: क़ब्रिस्तान २: ज़िंदगी का जाम ३: रिश्ता ४: मौत कब तलक तुम हुकूमत पे इतराओगे कब तक आखिर गरीबों को तड़पाओगे ज़ालिमों! बाद मरने के पछताओगे याद रखो! जहन्नम में तुम जाओगे क़ब्ज़-ए-पैके-अजल रूह कर जाएगा जिस्म बे-जां तड़प कर ठहर जाएगा क़ब्र में तो अकेला उतर जाएगा साथ तेरे न कोई बशर जाएगा बादशाहों की बिखरी हुई हड्डियां कह रही हैं न बनना कभी हुक्मरां एहतसाब इसका गुज़रेगा तुम पर गिरां हश्र में जब कि जाओगे मर मर मियां मौत का जानवर को हो इद्राक गर गोश्त अच्छा न खाने को पाए बशर ग़ाफ़िल इंसान से बढ़ गया जानवर मौत से आ गई है मगर बे-ख़बर छोड़ो आदत गुनाहों की जाओ सुधर वरना फंस जाओगे क़ब्र में सर बसर गर अज़ाबों को देखोगे जाओगे डर तुम बताओ कहां जाओगे भाग कर जोड़ कानें ख़ियानत से चमकाएंगे! क्या उन्हें ज़र के अंबार काम आएंगे? क़ब्र-ए-क़हार से क्या बचा पाएंगे? जी नहीं, नार-ए-दोज़ख़ में ले जाएंगे माल-ए-दुनिया है दोनों जहां में वबाल आएगा क़ब्र में साथ हरगिज़ न माल