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ऐ शहंशाह-ए-मदीना अस्सलातु वस्सलाम

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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ऐ शहंशाह-ए-मदीना अस्सलातु वस्सलाम ज़ीनत-ए-अर्श-ए-मुअल्ला अस्सलातु वस्सलाम रब्बि हब्ली उम्मती कहते हुए पैदा हुए हक़ ने फ़रमाया के बख़्शा अस्सलातु वस्सलाम दस्त-ए-बस्ता सब फ़रिश्ते पढ़ते हैं उन पर दुरूद क्यों न हो फिर विर्द अपना अस्सलातु वस्सलाम मोमिनों पढ़ते नहीं क्यों अपने आक़ा पर दुरूद है फ़रिश्तों का वज़ीफ़ा अस्सलातु वस्सलाम बुत-शिकन आया ये कह कर सर के बल बुत गिर गए झूम कर कहता था काबा अस्सलातु वस्सलाम सर झुका कर बा-अदब इश्क़-ए-रसूल-ए-अल्लाह में कह रहा था हर सितारा अस्सलातु वस्सलाम गुन्चे चटके फूल महके चहचहाएं बुलबुलें गुल खिला बाग़-ए-अहद का अस्सलातु वस्सलाम मैं वो सुन्नी हूँ जमील-ए-क़ादरी मरने के बाद मेरा लाशा भी कहेगा अस्सलातु वस्सलाम