ऐ शहंशाह-ए-मदीना अस्सलातु वस्सलाम
ज़ीनत-ए-अर्श-ए-मुअल्ला अस्सलातु वस्सलाम
रब्बि हब्ली उम्मती कहते हुए पैदा हुए
हक़ ने फ़रमाया के बख़्शा अस्सलातु वस्सलाम
दस्त-ए-बस्ता सब फ़रिश्ते पढ़ते हैं उन पर दुरूद
क्यों न हो फिर विर्द अपना अस्सलातु वस्सलाम
मोमिनों पढ़ते नहीं क्यों अपने आक़ा पर दुरूद
है फ़रिश्तों का वज़ीफ़ा अस्सलातु वस्सलाम
बुत-शिकन आया ये कह कर सर के बल बुत गिर गए
झूम कर कहता था काबा अस्सलातु वस्सलाम
सर झुका कर बा-अदब इश्क़-ए-रसूल-ए-अल्लाह में
कह रहा था हर सितारा अस्सलातु वस्सलाम
गुन्चे चटके फूल महके चहचहाएं बुलबुलें
गुल खिला बाग़-ए-अहद का अस्सलातु वस्सलाम
मैं वो सुन्नी हूँ जमील-ए-क़ादरी मरने के बाद
मेरा लाशा भी कहेगा अस्सलातु वस्सलाम