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Allah Humein Kar De Ata Qufl-e-Madina

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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अल्लाह हमें कर दे अता कुफ़्ल-ए-मदीना हर एक मुसलमां ले लगा कुफ़्ल-ए-मदीना या रब न ज़रूरत के सिवा कुछ कभी बोलूं! अल्लाह ज़बां का हो अता कुफ़्ल-ए-मदीना बक बक की ये आदत न सर-ए-हश्र फंसा दे अल्लाह ज़बां का हो अता कुफ़्ल-ए-मदीना हर लफ़्ज़ का किस तरह हिसाब आह! मैं दूं गा अल्लाह ज़बां का हो अता कुफ़्ल-ए-मदीना अक्सर मेरे होंटों पे रहे ज़िक्र-ए-मुहम्मद अल्लाह ज़बां का हो अता कुफ़्ल-ए-मदीना बढ़ता है ख़ामोशी से वक़ार ऐ मेरे प्यारे ऐ भाई! ज़बां पर तू लगा कुफ़्ल-ए-मदीना है दबदबा ख़ामोशी में हैबत भी है पिन्हां ऐ भाई! ज़बां पर तू लगा कुफ़्ल-ए-मदीना रख लेते थे पत्थर सुन अबूबक्र दहन में ऐ भाई! ज़बां पर तू लगा कुफ़्ल-ए-मदीना चुप रहने में ही सुख हैं तो ये तजुर्बा कर ले ऐ भाई! ज़बां पर तू लगा कुफ़्ल-ए-मदीना आक़ा की हया से झुकी रहती नज़र अक्सर आंखों पे मेरे भाई लगा कुफ़्ल-ए-मदीना गर देखेगा फ़िल्में तो क़यामत में फंसेगा आंखों पे मेरे भाई लगा कुफ़्ल-ए-मदीना आंखों में सर-ए-हश्र न भर जाए कहीं आग आंखों पे मेरे भाई लगा कुफ़्ल-ए-मदीना बोलूं न फ़ुज़ूल और रहें नीची निगाहें आंखों का ज़बां का दे ख़ुदा कुफ़्ल-ए-मदीना आएं न मुझे वसवसे और गंदे ख़यालात दे ज़हन का और दिल का ख़ुदा कुफ़्ल-ए-मदीना रफ़्तार का गुफ़्तार का किरदार का दे दे हर उज़ू का दे मुझ को ख़ुदा कुफ़्ल-ए-मदीना दोज़ख़ की कहां ताब है कमज़ोर बदन में हर उज़ू का अत्तार लगा कुफ़्ल-ए-मदीना