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अपना ग़म या शह-ए-अंबिया दीजिये चश्म-ए-नम या हबीब-ए-ख़ुदा दीजिये

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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अपना ग़म या शह-ए-अंबिया दीजिये, चश्म-ए-नम या हबीब-ए-ख़ुदा दीजिये। चाक सीना शह-ए-दूसरा दीजिये, क़ल्ब-ए-बे-चैन-ए-मुस्तफ़ा दीजिये। मुझ को आका मदीने बुला लीजिये, और मेहमान अपना बना लीजिये। दर पे बलवा के जलवा दिखा दीजिये, मेरा सीना मदीना बना दीजिये। इल्तिजा है मेरी या हबीब-ए-ख़ुदा, अश्कबार आँख हो जाए मुझ को अता। अज़ तुफ़ैल-ए-बिलाल-ओ-अवैस-ओ-रज़ा, आंसुओं का ख़ज़ाना शहा दीजिये। सोज़-ए-उल्फ़त के दिल में जलाए दिये, याद-ए-तैबा में जो जा रहे हैं जिये। और बे-ताब हैं हाज़री के लिए, उन को बैठा मदीना दिखा दीजिये। मुझ को अहबाब तन्हा चले छोड़ कर, जल्द लीजे ख़बर आमना के पिसर! घप अंधेरा है या शाह-ए-जिन्न-ओ-बशर, नूर से लहद अब जगमगा दीजिये। है गुनाहों का अंबार सुल्तान-ए-दीं!, नेकियां मेरे पल्ले में कुछ भी नहीं। चाक हो जाए पर्दा न मेरा कहीं, अब ख़ुदा से शहा! बख्शवा दीजिये। काश! नेकी की दावत में दूं जा-ब-जा, सुन्नतें आम करता रहूं जा-ब-जा। गर सितम हो उसे भी सहूं जा-ब-जा, ऐसी हिम्मत हबीब-ए-ख़ुदा दीजिये। फिर अरब की हसीं वादियां देखने, सब्ज़ गुंबद की हरियां देखिये। रौज़ा-ए-पाक की जालियां देखने, इज़्न-ए-बदकार को मुस्तफ़ा दीजिये। है तमन्ना-ए-अत्तार अंदूगीं, हो निगाह-ए-करम उस पे सुल्तान-ए-दीं। बस बक़ी-ए-मुबारक में दो गज़ ज़मीं, अज़ तुफ़ैल-ए-शह-ए-कर्बला दीजिये।