अपना ग़म या शह-ए-अंबिया दीजिये, चश्म-ए-नम या हबीब-ए-ख़ुदा दीजिये।
चाक सीना शह-ए-दूसरा दीजिये, क़ल्ब-ए-बे-चैन-ए-मुस्तफ़ा दीजिये।
मुझ को आका मदीने बुला लीजिये, और मेहमान अपना बना लीजिये।
दर पे बलवा के जलवा दिखा दीजिये, मेरा सीना मदीना बना दीजिये।
इल्तिजा है मेरी या हबीब-ए-ख़ुदा, अश्कबार आँख हो जाए मुझ को अता।
अज़ तुफ़ैल-ए-बिलाल-ओ-अवैस-ओ-रज़ा, आंसुओं का ख़ज़ाना शहा दीजिये।
सोज़-ए-उल्फ़त के दिल में जलाए दिये, याद-ए-तैबा में जो जा रहे हैं जिये।
और बे-ताब हैं हाज़री के लिए, उन को बैठा मदीना दिखा दीजिये।
मुझ को अहबाब तन्हा चले छोड़ कर, जल्द लीजे ख़बर आमना के पिसर!
घप अंधेरा है या शाह-ए-जिन्न-ओ-बशर, नूर से लहद अब जगमगा दीजिये।
है गुनाहों का अंबार सुल्तान-ए-दीं!, नेकियां मेरे पल्ले में कुछ भी नहीं।
चाक हो जाए पर्दा न मेरा कहीं, अब ख़ुदा से शहा! बख्शवा दीजिये।
काश! नेकी की दावत में दूं जा-ब-जा, सुन्नतें आम करता रहूं जा-ब-जा।
गर सितम हो उसे भी सहूं जा-ब-जा, ऐसी हिम्मत हबीब-ए-ख़ुदा दीजिये।
फिर अरब की हसीं वादियां देखने, सब्ज़ गुंबद की हरियां देखिये।
रौज़ा-ए-पाक की जालियां देखने, इज़्न-ए-बदकार को मुस्तफ़ा दीजिये।
है तमन्ना-ए-अत्तार अंदूगीं, हो निगाह-ए-करम उस पे सुल्तान-ए-दीं।
बस बक़ी-ए-मुबारक में दो गज़ ज़मीं, अज़ तुफ़ैल-ए-शह-ए-कर्बला दीजिये।