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Aye Saba Tera Guzar Ho Jo Madina Mein Kabhi

Written by Mufti Ahmad Yar Khan Naeemi

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ऐ सबा तेरा गुज़र हो जो मदीना में कभी जाना उस गुम्बद-ए-ख़ज़रा में कि हैं जिस में नबी हाथ से अपने पकड़ कर वो सुनहरी जाली अर्ज़ करना मेरी जानिब से बसद शौक़-ए-दिली है तमन्ना यह ख़ुदा से कि रसूल-ए-अरबी अपनी आंखों को मलूं आप की चौखट से नबी उम्र सारी तो कटी लह्व-ओ-लब में आका ज़िंदगी का कोई लम्हा नहीं अच्छा गुज़रा सारे आमाल-ए-सियह जुर्म से दफ़्तर है भरा आरज़ू है कि गुनाहों का हो यूं कफ़्फ़ारा है तमन्ना यह ख़ुदा से कि रसूल-ए-अरबी अपनी आंखों को मलूं आप की चौखट से नबी अर्ज़ करना कि कहाँ मुझ सा कमीना गन्दा और वो शहर कहाँ जिस में हों महबूब-ए-खुदा हाँ सुना है कि निभाते हैं बुरों को मौला इस लिए आप के दरवाज़े पे देता है सदा है तमन्ना ये खुदा से कि रसूल-ए-अरबी अपनी आँखों को मिलूँ आप की चौखट से नबी आरज़ू दिल की है जब बंद हो हरकत-ए-दिल की आँख पथराए मुझे आए अख़ीरी हिचकी रूह जाने लगे जब छोड़ के जिस्म-ए-खाकी जिस्म तैबा में हो और जान चले सू-ए-नबी है तमन्ना ये खुदा से कि रसूल-ए-अरबी अपनी आँखों को मिलूँ आप की चौखट से नबी या नबी इस के सिवा मैं क्या अर्ज़ करूँ आप का हूँ के जियूँ आप का हो के ही मरूँ आप के दर से पला आप के दर पर ही मिटूँ जान तुम से मिली तुम पर ही निछावर कर दूँ है तमन्ना ये खुदा से कि रसूल-ए-अरबी अपनी आँखों को मिलूँ आप की चौखट से नबी गर मयस्सर नहीं सालिक को हुज़ूर-ए-बदनी रूह हाज़िर है मगर मिसल-ए-उवैस-ए-क़रनी जिस्म-ए-हिंदी है मेरा जान है मेरी मदनी या खुदा दूर किसी तरह हो बुअद-ए-बदनी है तमन्ना ये खुदा से कि रसूल-ए-अरबी अपनी आँखों को मिलूँ आप की चौखट से नबी