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Azizon ki taraf se jab mera dil toot jaata hai

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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अज़ीज़ों की तरफ से जब मेरा दिल टूट जाता है तेरा लुत्फ़-ओ-करम बढ़ कर मेरी ढांरस बंधाता है नबी के नूर का सदक़ा ख़ुदाया जगमगा देना करम! या रब! अंधेरा क़ब्र का मुझ को डराता है मुसलसल मौत नज़दीक आ रही है, हाए! बर्बादी करम! मौला! गुनाहों का मरज़ बढ़ता ही जाता है इलाही! वास्ता प्यारे का, मेरी मफ़िरत फ़रमा अज़ाब-ए-नार से मुझ को ख़ुदाया ख़ौफ़ आता है तेरी सुन्नत पे चलता हूँ, तो ताने लोग देते हैं शहनशाह-ए-मदीना! नफ़्स भी बे-हद सताता है मुबारक बाद देते हो मुझे, हम भाइयो हज्ज की मदीना छोड़ने का ग़म मुझे तो खाए जाता है मसाएब में कभी हर्फ़-ए-शिकायत लब पे मत लाना वो कर के मुब्तला बंदों को अपने आज़माता है नई उम्मीद मिलती है, दिल-ए-मायूस को फिर से मुझे शाह-ए-मदीना! जब मदीना याद आता है मुझे लगता है वो मीठा, मुझे लगता है वो प्यारा अमामा सर पे, ज़ुल्फ़ें और दाढ़ी जो सजाता है ख़ुदा ठंडी करे उस की आँखें हश्र में अत्तार यहाँ जो सोज़-ए-उल्फ़त में जिगर अपना जलाता है अल्लाह अज़्ज़वजल इरशाद फ़रमाता है: वल-नबलु-वन्ना-कुम बि-शय-इन मिनल खौफ़ी वल जू-ई व नक़्सिम मिनल अमवालि वल अनफुसि वसम-रात (प २, अल-बक़रह: १५५) तर्जुमा कन्ज़-उल-ईमान: और ज़रूर हम तुम्हें आज़माएंगे कुछ डर और भूख से और कुछ मालों और जानों और फलों की कमी से।