अज़्म-ए-दाढ़ी का जब है सर पे इमामा सजा है
सब क़बीला मुखालिफ़ हुआ है या नबी इस पे रहम खाना
हो गया जुर्म सुन्नत पे चलना और उल्फ़त में तेरी मचलना
मीठी सुन्नत से लोगों का हटना आ गया हाय कैसा ज़माना
तू ठहर जा ज़रा रूह-ए-मुज़्तर आनेवाला है मीठा मदीना
जबके आए नज़र सब्ज़ गुम्बद तन से हो जाना उस दम रवाना
जल्द दफ़नाओ मय्यत ख़ुदारा खुल न जाए कहीं भेद सारा
मेरे चेहरे से मेरे अज़ीज़ो! तुम कफ़न को न हरगिज़ हटाना
हिज्र में जो तड़पते हैं आका! याद-ए-तैबा में रोते हैं आका!
देख लें वो भी शाह-ए-मदीना सब्ज़ गुम्बद का मंज़र सुहाना
दुश्मन-ए-दीं अक्सर खड़ा है हासिदों का हसद बढ़ चला है
ज़ुल्म-ए-हर सिम्त से हो रहा है जल्द अत्तार को तुम बचाना