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बख्त-ए-खुफ्ता ने मुझे रौज़ा पे जाने न दिया

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

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बख्त-ए-खुफ्ता ने मुझे रौज़ा पे जाने न दिया चश्म ओ दिल सीने कलेजे से लगाने न दिया आह किस्मत मुझे दुनिया के ग़मों ने रोका हाए तकदीर कि तैय्यबा मुझे जाने न दिया पाँव थक जाते अगर पाँव बनाता सर को सर के बदल जाता मगर ज़ुअफ़ ने जाने न दिया इतना कमज़ोर किया ज़ुअफ़-ए-क़ुवा ने मुझ को पाँव तो पाँव मुझे सर भी उठाने न दिया सर तो सर जान से जाने की मुझे हसरत है मौत ने हाए मुझे जान से जाने न दिया हाल-ए-दिल खोल के दिल आह अदा कर न सका इतना मौका ही मुझे मेरी क़ज़ा ने न दिया हाए उस दिल की लगी को मैं बुझाऊं क्योंकर फ़र्त-ए-ग़म ने मुझे आँसू भी गिराने न दिया हाथ पकड़े हुए ले जाते जो तैय्यबा मुझ को साथ इतना भी तो मेरे रुफ़क़ा ने न दिया सजदा करता जो मुझे उसकी इजाज़त होती क्या करूँ इज़्न मुझे उसका ख़ुदा ने न दिया हसरत-ए-सजदा यूँही कुछ तो निकलती लेकिन सर भी सरकार ने क़दमों पे झुकाने न दिया कूचा-ए-दिल को बसा जाती महक से तेरी काम इतना भी मुझे बाद-ए-सबा ने न दिया कभी बीमार-ए-मोहब्बत भी हुए हैं अच्छे रोज़-ए-अफ़रोज़ है मरज़ काम दवा ने न दिया शर्बत-ए-दीद ने और आग लगादी दिल में तपिश-ए-दिल को बढ़ाया है बुझाने न दिया अब कहाँ जाएगा नक़्शा तेरा मेरे दिल से तह में रखा है इसे दिल ने गमाने न दिया देस से उनके जो उलफ़त है तो दिल ने मेरे इस लिए देस का जंगल भी तो गाने न दिया देस की धन है वही राग अलापा उसने नफ़्स ने हाए ख़याल उसका मिटाने न दिया नफ़्स-ए-बदकार ने दिल पर ये क़यामत तोड़ी अमल-ए-नेक किया भी तो छुपाने न दिया नफ़्स-ए-बदकेश है किस बात का दिल पे शाकी क्या बुरा दिल ने किया ज़ुल्म कमाने न दिया मेरे आमाल का बदला तो जहन्नम ही था मैं तो जाता मुझे सरकार ने जाने न दिया मेरे आमाल-ए-सय्यह ने किया जीना दूभर ज़हर खाता तेरे इरशाद ने खाने न दिया और चमकती सी ग़ज़ल कोई पढ़ो ऐ नूरी रंग अपना अभी हम ने शुअरा ने न दिया