बख़ुदा ख़ुदा से है वो जुदा जो हबीब-ए-हक़ पे फ़िदा नहीं
वो बशर है दीन से बे-ख़बर जो रहे नबी में गुमा नहीं
उसे ढूँढे क्यों कोई दर-ब-दर वो हैं जान से भी क़रीब तर
वो निहाँ भी है वो अयाँ भी है वो चुनीं भी है वो चुनां भी है
वही जब भी था वही अब भी है वो छुपा है फिर भी छुपा नहीं