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दावत-ए-इस्लामी से क्यों प्यार है

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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दुश्मनाने दीन को कर दो तबाह अर्ज़ तुम से हैदर-ए-कर्रार है दामने अहमद रज़ा मुझ को मिला हां ये इनाम-ए-शह-ए-अबरार है हूं ज़ियाउद्दीन का अदना गदा मेरे मुर्शद का सखी दरबार है तुम को कुछ मालूम है यारो! मुझे दावत-ए-इस्लामी से यूं प्यार है है करम इस पर खुदाए पाक का दावत-ए-इस्लामी से यूं प्यार है इस पे है नज़्रे करम सरकार की दावत-ए-इस्लामी से यूं प्यार है बे-अदद काफिर मुसलमान हो गए दावत-ए-इस्लामी से यूं प्यार है बे-नमाज़ी भी नमाज़ी हो गए दावत-ए-इस्लामी से यूं प्यार है चोर डाकू आए और ताइब हुए दावत-ए-इस्लामी से यूं प्यार है ज़ानी व क़ातिल भी ताइब हो गए दावत-ए-इस्लामी से यूं प्यार है और शराबी आए ताइब हो गए दावत-ए-इस्लामी से यूं प्यार है सुन्नतों की हर तरफ़ आई बहार दावत-ए-इस्लामी से यूं प्यार है बख्वाना आप ही अत्तार को सब गुनहगारों का ये सरदार है