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दिल हाय गुनाहों से बेज़ार नहीं होता

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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दिल हाय गुनाहों से बेज़ार नहीं होता मगलूब शहा! नफ़्स-ए-बदकार नहीं होता शैतान मुसल्लत है अफ़सोस! किसी सूरत अब सब्र-ए-गुनाहों पर सरकार नहीं होता ऐ रब के हबीब आओ! ऐ मेरे तबीब आओ अच्छा यह गुनाहों का बीमार नहीं होता गो लाख करूँ कोशिश इस्लाह नहीं होती पाकीज़ा गुनाहों से किरदार नहीं होता यह सांस की माला अब बस टूटने वाली है दिल आह! मगर अब भी बेदार नहीं होता सुन्नत की तरफ लोगो! तुम क्यों नहीं आ जाते क्यों सर्द गुनाहों का बाज़ार नहीं होता सरकार का आशिक़ भी क्या दाढ़ी मुंडाता है! क्यों इश्क़ का चेहरे से इज़हार नहीं होता आक़ा की इताअत से जी अपना चुराते हैं जो, ऐसों से ख़ुश रब-ए-ग़फ़्फ़ार नहीं होता जीने का मज़ा उस को मिलता ही नहीं जिस का दिल इश्क़-ए-मुहम्मद से सरशार नहीं होता जो याद-ए-मदीना में दिन रात तड़पते हैं दूर उन से मदीने का दरबार नहीं होता मग़मूम है ग़म जिस को आक़ा का नहीं मिलता बीमार है जो उन का बीमार नहीं होता खुशियों में मसर्रत में आसाइश ओ राहत में असरार-ए-मोहब्बत का इज़हार नहीं होता वह इश्क़-ए-हक़ीक़ी की लज़्ज़त नहीं पा सकता जो रंज ओ मुसीबत से दो चार नहीं होता ऐ ज़ाइर-ए-तैयबा! तू दम तोड़ दे चौखट पर दीदार-ए-मदीने का हर बार नहीं होता कौन ऐसी करे जुरअत कह सकता नहीं आक़िल सरकार का दीवाना होशियार नहीं होता आ जाए मदीने में ले जाए ज़रा सी ख़ाक जो ठीक किसी सूरत बीमार नहीं होता ऐ साइलो! आ जाओ और झोलियां फैलाओ दरबार-ए-रिसालत से इंकार नहीं होता वह बहर-ए-सख़ावत हैं वह क़ासिम-ए-नेमत हैं तैयबा का गदा हरगिज़ नादार नहीं होता दुनिया में भी ठंडा है उक़्बा में भी ठंडा है जो उन का है दीवाना वह ख़्वार नहीं होता दुनिया में भी जलता है उक़्बा में भी जलता है मैं कैसे कहूँ मुनकिर फ़िन-नार नहीं होता छोड़ो ऐ फ़रिश्तो वह, आते हैं शफ़ाअत को वह जिस के भी हामी हैं फ़िन-नार नहीं होता अफ़सोस नदामत भी इस्यां पे नहीं होती नेकी की तरफ माइल-ए-अत्तार नहीं होता आक़ा का गदा हो कर अत्तार तू घबराए घबराए दुही जिस का ग़मख़्वार नहीं होता