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Dil se mere duniya ki mohabbat nahi jaati

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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दिल से मरे दुनिया की महब्बत नहीं जाती सरकार! गुनाहों की भी आदत नहीं जाती दिन रात मुसलसल है गुनाहों का तसल्सुल कुछ तुम ही करो ना ये नहूसत नहीं जाती खाने की ज़ियादत है तो सोने की भी कसरत और ख़ंदा-ए-बे-जा की भी ख़सलत नहीं जाती गो पेश-ए-नज़र क़ब्र का फूल गढ़ा है अफ़्सोस! मगर फिर भी ये ग़फ़लत नहीं जाती ऐ रहमत-ए-कौ़नैन! कमीने पे करम हो हाए! नहीं जाती बुरी ख़सलत नहीं जाती जी चाहता है फूट के रओूं तेरे ग़म में सरकार! मगर दिल की क़सावत नहीं जाती क्या हो गया सरकार! खयालों को हमारे अग्यार के फेशन की नुहूसत नहीं जाती गो लाख बुरा ही सही मायूस नहीं हूं सद शुक्र के उम्मीद-ए-शफ़ाअत नहीं जाती आदत मुझे मालूम है आक़ा की किसी का दिल तोड़ के जाती नहीं रहमत नहीं जाती "अपनों" को तो सरकार! तबाही से बचा लो बेचारों के सीनों से अदावत नहीं जाती अल्लाह ग़नी! शान-ए-वली! राज़ दिलों पर दुनिया से चले जाएं हुकूमत नहीं जाती कुछ ऐसी कशिश तुझ में है ऐ शहर-ए-मदीना! गो हाज़िरी सौ बार हो हसरत नहीं जाती नैरंगी-ए-दुनिया के तमाशों की ख़बर है अत्तार तो क्यों दिल से यह उल्फ़त नहीं जाती