ग़म-ए-फ़ुरक़त लाए काश हर दम या रसूलल्लाह
रहूँ हर वक़्त में बादिया-ए-ग़म या रसूलल्लाह
जिगर भी सोख्ता जाँ सोख्ता, दिल चाक सीना चाक
मिले ग़म और ग़म बस आप का ग़म या रसूलल्लाह
नहीं ताज-ए-शाही की आरज़ू बस एक अरमाँ है
निकल जाए तुम्हारे रूबरू दम या रसूलल्लाह
मेरे आक़ा बहाए अश्क जो बहर-ए-मदीना में
अता कर दो मुझे वो चश्म-ए-पुर-नम या रसूलल्लाह
हमारे दिल की हर धड़कन से तैबा की सदा निकले
रहे ज़िक्र-ए-मदीना लब पे हर दम या रसूलल्लाह
शाह! चश्म-ए-करम हो तशनगान-ए-दीद पर अब तो
तुम्हारी दीद का शरबत पिएं हम या रसूलल्लाह
मदीना...
ऐ: दीदार के प्यासे