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गम हो गए बेशुमार आका

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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गम हो गए बेशुमार आका बंदा तेरे निसार आका बिगड़ा जाता है खेल मेरा आका आका संवार आका मँजधार पे आ गई नाउ टूटी दे हाथ कि हूँ मैं पार आका टूटी जाती है पीठ मेरी लिल्लाह यह बोझ उतार आका हल्का है अगर हमारा पल्ला भारी है तेरा वकार आका मजबूर हैं हम तो फिक्र क्या है तुम को तो है इख़्तियार आका मैं दूर हूँ तुम हो मेरे पास सुन लो मेरी पुकार आका मुझ सा कोई ग़मज़दा न होगा तुम सा नहीं ग़म-गुसार आका ग़रदाब में पड़ गई है कश्ती डूबा डूबा उतार आका तुम वो कि करम को नाज़ तुम से मैं वो कि बदी को आर आका फिर मुँह न पड़े कभी ख़िज़ाँ का दे दे ऐसी बहार आका जिस की मर्ज़ी ख़ुदा न टाले मेरा है वो नामदार आका है मुल्क-ए-ख़ुदा पे जिस का क़ब्ज़ा मेरा है वो कामगार आका सोया किए नाबकार बंदे रोया किए ज़ार ज़ार आका क्या भूल है उन के होते कहलाएँ दुनिया के ये ताजदार आका उन के अदना गदा पे मिट जाएँ ऐसे ऐसे हज़ार आका बे अब्र-ए-करम के मेरे धब्बे ला तग़सिलुहाल्बिहारु आका इतनी रहमत रज़ा पे कर लो ला यक़रबुहुलबवारु आका