Home/Imam Ahmad Raza Khan Qadri/Ghazal Ke Darbarah-e-Azm-e-Safar-e-Athar-e-Madina Munawara Az Makka Muazzama Ba'ad Hajj Muharram 1296 AH Arz Karda Shud

ग़ज़ल के दरबारा-ए-अज़्म-ए-सफ़र-ए-अतहर-ए-मदीना मुनव्वरा अज़ मक्का मुअज़्ज़मा बा'द हज मुहर्रम 1296 हिजरी अर्ज़ करदा शुद

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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हाजियों! आओ शहन्शाह का रौज़ा देखो काबा तो देख चुके काबा का काबा देखो रुक्न-ए-शामी से मिटी वहशत-ए-शाम-ए-ग़ुरबत अब मदीना को चलो सुब्ह-ए-दिल आरा देखो आब-ए-ज़मज़म तो पिया खूब बुझाएं प्यासें आओ जूद-ए-शाह-ए-कौसर का भी दरिया देखो ज़ेर-ए-मीज़ाब मिले खूब करम के छींटे अब्र-ए-रहमत का यहां ज़ोर बरसना देखो धूम देखी है दर-ए-काबा पे बेताबों की उन के मुश्ताक़ों में हसरत का तड़पना देखो मिस्ल-ए-परवाना फिरा करते थे जिस शमा के गिर्द अपनी उस शमा को परवाना यहां का देखो खूब आंखों से लगाया है ग़िलाफ़-ए-काबा क़स्र-ए-महबूब के पर्दे का भी जलवा देखो वां मुतीओं का जिगर ख़ौफ़ से पानी पाया यां सियह कारों का दामन पे मचलना देखो अव्वलीन ख़ाना-ए-हक़ की तो ज़ियाएं देखें आखिरीन बैत-ए-नबी का भी तजल्ला देखो ज़ीनत-ए-काबा में था लाख़ अरूसों का बनाओ जलवा फ़रमा यहां कौनैन का दुल्हा देखो ऐमन-ए-तूर का था रुक्न-ए-यमानी में फ़रो ग़ शोला-ए-तूर यहां अंजुमन आरा देखो मेहर-ए-मादर का मज़ा देती है आगोश-ए-हतीम जिन पे मां बाप फ़िदा यां करम उन का देखो अर्ज़-ए-हाजत में रहा काबा कफ़ील-ए-इन्जाह आओ अब रोईए शह-ए-तैबा का देखो धो चुका ज़ुल्मत-ए-दिल बोसा-ए-संग-ए-असवद ख़ाक-ए-बोसी-ए-मदीना का भी रुतबा देखो कर चुकी रिफ़अत-ए-काबा पे नज़र परवाज़ें टोपी अब थाम के ख़ाक-ए-दर-ए-वाला देखो बे-नियाज़ी से वहां कांपती पाई ताअत जोश-ए-रहमत पे यहां नाज़-ए-गुनाह का देखो जुमा-ए-मक्का था ईद-ए-अहल-ए-इबादत के लिए मुजरिमों! आओ यहां ईद-ए-दोशंबा देखो मुल्तज़म से तो गले लग के निकाले अरमां अदब-ओ-शौक़ का यहां बाहम उलझना देखो खूब मसव्आ में बा-उम्मीद-ए-सफ़ा दौड़ लिए रह-ए-जानां की सफ़ा का भी तमाशा देखो रक़्स-ए-बिस्मिल की बहारें तो मिना में देखें दिल-ए-ख़ूनाबा फ़िशां का भी तड़पना देखो ग़ौर से सुन तो रज़ा काबा से आती है सदा मेरी आंखों से मेरे प्यारे का रौज़ा देखो