अंबिया को भी अजल आनी है
मगर ऐसी कि फ़क़त आनी है
फिर उसी आन के बाद उन की हयात
मिस्ले साबिक़ वही जिस्मानी है
रूह तो सब की है ज़िंदा उन का
जिस्म पुर-नूर भी रूहानी है
औरों की रूह हो कितनी ही लतीफ़
उन के अज़साम की कब सानी है
पांव जिस ख़ाक पे रख दें वो भी
रूह है पाक है नूरानी है
उस की अज़वाज को जाइज़ है निकाह
उस का तरका बेटे जो फ़ानी है
ये हैं हय्ये अबदी उन को रज़ा
सिदक़-ए-वादा की क़ज़ा मानी है