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हबीब-ए-खुदा का नज़ारा करूँ मैं

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

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हबीब-ए-खुदा का नज़ारा करूँ मैं दिल-ओ-जान उन पर निसार करूँ मैं तेरी कफ़-ए-पा यूँ संवारा करूँ मैं के पलकों से उसको बहारा करूँ मैं तेरी रहमतें आम हैं फिर भी प्यारे ये सदमात-ए-फ़ुरक़त सहारा करूँ मैं मुझे अपनी रहमत से तू अपना करले सिवा तेरे सब से किनारा करूँ मैं मैं क्यों ग़ैर की ठोकरें खाने जाऊँ तेरे दर से अपना गुज़ारा करूँ मैं सलासिल मसाइब के अबरू से काटो कहाँ तक मसाइब गवारा करूँ मैं ख़ुदाया अब आओ के दम है लबों पर दम-ए-वापसी तू नज़ारा करूँ मैं तेरे नाम पर सर को क़ुर्बान करके तेरे सर से सदक़ा उतारा करूँ मैं ये इक जान क्या है अगर हों करोड़ों तेरे नाम पर सब को वारा करूँ मैं मुझे हाथ आए अगर ताज-ए-शाही तेरी कफ़-ए-पा पर निसारा करूँ मैं तेरा ज़िक्र-ए-लब पर ख़ुदा दिल के अंदर यूँही ज़िंदगानी गुज़ारा करूँ मैं दम-ए-वापसी तक तेरे गीत गाऊँ मोहम्मद मोहम्मद पुकारा करूँ मैं तेरे दर के होते कहाँ जाऊँ प्यारे कहाँ अपना दामन पसारा करूँ मैं मेरा दीन-ओ-ईमान फ़रिश्ते जो पूछें तुम्हारी ही जानिब इशारा करूँ मैं ख़ुदा ऐसी क़ुव्वत दे मेरे क़लम में के बद-मज़हबों को सुधारा करूँ मैं जो हो क़ल्ब-ए-सोना तो ये है सुहागा तेरी याद से दिल निखारा करूँ मैं ख़ुदा एक पर हो तो इक पर मोहम्मद अगर क़ल्ब अपना दो पारा करूँ मैं ख़ुदा ख़ैर से लाए वो दिन भी नूरी मदीने की गलियाँ बहारा करूँ मैं सबा ही से नूरी सलाम अपना कह दे सिवा इस के क्या और चारा करूँ मैं