Home/Imam Ahmad Raza Khan Qadri/Hirz-e-Jaan Zikr-e-Shafaat Kijiye

Hirz-e-Jaan Zikr-e-Shafaat Kijiye

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

100%
हर्ज़-ए-जाँ ज़िक्र-ए-शफ़ाअत कीजिये नार से बचने की सूरत कीजिये उन के नक़्श-ए-पा पे ग़ैरत कीजिये आँख से छुप कर ज़ियारत कीजिये उन के हुस्न-ए-बा-मलाहत पर निसार शीरा-ए-जाँ की हलावत कीजिये उन के दर पर जैसे हो मिट जाइये नातवानो! कुछ तो हिम्मत कीजिये फिर दबिये पंजा-ए-देव-ए-लईं मुस्तफ़ा के बल पे ताक़त कीजिये डूब कर याद-ए-लब-ए-शादाब में आब-ए-कौसर की सबाहत कीजिये याद-ए-क़ामत करते उठिये क़ब्र से जान-ए-महशर पर क़यामत कीजिये उन के दर पर बैठिये बन कर फ़क़ीर बे-नवाओ फ़िक्र-ए-सरवत कीजिये जिस का हुस्न-ए-अल्लाह को भी भा गया ऐसे प्यारे से मोहब्बत कीजिये हय-ए-बाक़ी जिस की करता है सना मरते दम तक उस की मिदहत कीजिये अर्श पर जिस की कमानें चढ़ गईं सदक़े उस बाज़ू पे क़ुव्वत कीजिये नीम-वा तैबा के फूलों पर हो आँख बुलबुलों! पास-ए-नज़ाकत कीजिये सर से गिरता है अभी बार-ए-गुनाह खम ज़रा फ़र्क़-ए-इरादत कीजिए आंख तो उठती नहीं क्या दें जवाब हम पे बे-पुर्सिश ही रहमत कीजिए उज़्र-ए-बदतर अज़ गुनाह का ज़िक्र क्या बे-सबब हम पर इनायत कीजिए नअरा कीजिए या रसूल अल्लाह का मुफ़्लिसो! सामान-ए-दौलत कीजिए हम तुम्हारे हो के किस के पास जाएं सदक़ा शहज़ादों का रहमत कीजिए मं रानी क़द र-अल हक़ जो कहे क्या बयान उस की हक़ीक़त कीजिए आलम-ए-इल्म-ए-दो आलम हैं हुज़ूर आप से क्या अर्ज़-ए-हाजत कीजिए आप सुलतान-ए-जहाँ हम बे-नवा याद हम को वक़्त-ए-नेमत कीजिए तुझ से क्या क्या ए मेरे तैबा के चांद ज़ुल्मत-ए-ग़म की शिकायत कीजिए दर-ब-दर कब तक फिरें खस्ता खराब तैबा में मदफ़न इनायत कीजिए हर बरस वह क़ाफ़िलों की धूम धाम आह सीने और ग़फ़लत कीजिए फिर पलट कर मुंह न उस जानिब किया सच है और दवा-ए-उल्फ़त कीजिए अक़्रबा हुब्ब-ए-वतन बे-हिमती आह किस किस की शिकायत कीजिए अब तो आक़ा मुंह दिखाने का नहीं किस तरह रफ़-ए-नदामत कीजिए अपने हाथों खुद लुटा बैठे हैं घर किस पे दवा-ए-बज़ाअत कीजिए किस से कहिए क्या क्या क्या हो गया खुद ही अपने पर मलामत कीजिए अर्ज़ का भी अब तो मुंह पड़ता नहीं क्या इलाज-ए-दर्द-ए-फ़ुर्क़त कीजिए अपनी एक मीठी नज़र के शहद से चारा-ए-ज़हर-ए-मुसीबत कीजिए दे ख़ुदा हिम्मत के यह जान-ए-हज़ीं आप पर वारें वह सूरत कीजिए आप हम से बढ़ के हम पर मेहरबां हम करें जुर्म आप रहमत कीजिए जो न भूला हम ग़रीबों को रज़ा याद उस की अपनी आदत कीजिए