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हम ख़ाक हैं और ख़ाक ही मावा है हमारा

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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हम ख़ाक हैं और ख़ाक ही मावा है हमारा ख़ाकी तो वो आदम जद्द-ए-आला है हमारा अल्लाह हमें ख़ाक करे अपनी तलब में यह ख़ाक तो सरकार से तमग़ा है हमारा जिस ख़ाक पे रखते थे क़दम सय्यिद-ए-आलम उस ख़ाक पे क़ुर्बान दिल-ए-शैदा है हमारा ख़म हो गई पुश्त-ए-फ़लक इस तअ्न-ए-ज़मीं से सुन हम पे मदीना है वो रुतबा है हमारा उस ने लक़ब-ए-ख़ाक शहंशाह से पाया जो हैदर-ए-करार के मौला है हमारा ऐ मुद्दईओ! ख़ाक को तुम ख़ाक न समझो इस ख़ाक में मफ़ून शह-ए-बतहा है हमारा है ख़ाक से तामीर-ए-मज़ार-ए-शह-ए-कौनैन मामूर इसी ख़ाक से क़िबला है हमारा हम ख़ाक उड़ाएंगे जो वो ख़ाक न पाई आबाद रज़ा जिस पे मदीना है हमारा