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जान ओ दिल या रब हो क़ुर्बान हबीब-ए-किब्रिया

Written by Maulana Muhammad Jamil-ur-Rehman Razvi

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जान ओ दिल या रब हो क़ुर्बान हबीब-ए-किब्रिया और हाथों में हो दामान-ए-हबीब-ए-किब्रिया आंख में हो नूर ओ निदां-ए-हबीब-ए-किब्रिया सर में हो सौदा ओ अरमान-ए-हबीब-ए-किब्रिया उन के फ़ैज़-ए-नूर ने कौनैन को रौशन किया दोनों आलम पर है एहसान-ए-हबीब-ए-किब्रिया ज़िंदगी हो या मुझे मौत आए दोनों हाल में मैं हूं या रब और बयाबान-ए-हबीब-ए-किब्रिया कैसा फ़ख़्र ओ नाज़ हो अपने मुक़द्दर पर अगर सग बनाएं मुझ को दरबान-ए-हबीब-ए-किब्रिया एक नज़र देखो जमाल-ए-आफ़ताब-ए-हाशमी मेरी आंखों पर हो एहसान-ए-हबीब-ए-किब्रिया बन के मंगता उन के दर के शाह-ए-आलम हो गए ऐ ज़हे क़िस्मत गदायान-ए-हबीब-ए-किब्रिया