Home/Allama Hasan Raza Khan/Jaan se tang hain qaidi gham-e-tanhai ke

जान से तंग हैं क़ैदी ग़म-ए-तन्हाई के

Written by Allama Hasan Raza Khan

100%
जान से तंग हैं क़ैदी ग़म-ए-तन्हाई के सदक़े जाऊं मैं तेरी अंजुमन आरायी के बज़्म आरा हों उजाले तेरी ज़ेबा ई के कब से मुश्ताक़ हैं आईने ख़ुद आरा ई के हो ग़ुबार-ए-दर-ए-महबूब कि गर्द-ए-रह-ए-दोस्त जुज़-ए-आज़म हैं यही सुरमा-ए-बीना ई के ख़ाक हो जाए अगर तेरी तमन्नाओं में क्यों मिलें ख़ाक में अरमान-ए-तमन्ना ई के व रफ़अना लका ज़िकरक के चमकते ख़ुर्शीद ला-मकां तक हैं उजाले तेरी ज़ेबा ई के दिल-ए-मुश्ताक़ में अरमान-ए-लिक़ा आंखें बंद क़ाबिल-ए-दीद हैं अंदाज़-ए-तमन्ना ई के लब-ए-जां बख़्श की क्या बात है सुब्हानल्लाह तुम ने ज़िंदा किए एजाज़-ए-मसीहा ई के अपने दामन में छुपाएं वो मरे ऐबों को ऐ ज़हे बख़्त मेरी ज़िल्लत-ओ-रुसवाई के देखने वाले ख़ुदा के हैं ख़ुदा शाहिद है देखने वाले तेरे जलवा-ए-ज़ेबा ई के जब ग़ुबार-ए-रह-ए-महबूब ने इज़्ज़त बख़्शी आईने साफ़ हुए ऐनक-ए-बीना ई के बार-ए-सर पर है नक़ाहत से गिरा जाता हूँ सदक़े जाऊं तेरे बाज़ू की तवाना ई के आलिमुल्ग़ैब ने हर ग़ैब से आगाह किया सदक़े उस शान की बीना ई व दाना ई के देखने वाले हो तुम रात की तारीकी में कान में सम्अ के और आंख में बीना ई के गैबी नुत्फ़े हैं वो बे-इल्म-ए-जहम के अंधे जिन को इनकार हैं इस इल्म-ओ-शनासा ई के ऐ हसन काअबा ही अफ़ज़ल सही उस दर से मगर हम तो ख़ूगर हैं यहां नासिया फ़रसा ई के