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झूम कर सारे पुकारो मरहबा या मुस्तफा

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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झूम कर सारे पुकारो मरहबा या मुस्तफा, चूम कर लब दो जहां मरहबा या मुस्तफा कह कर ऐ इसयान-ए-शियारो मरहबा या मुस्तफा, बिगड़ी किस्मत को संवारो मरहबा या मुस्तफा मुफ्लिस-ओ-गुरबत के मारो मरहबा या मुस्तफा, तुम भी कह दो माल-दारो मरहबा या मुस्तफा कह के दामन को पसारो मरहबा या मुस्तफा, बादशाहो नामदारो मरहबा या मुस्तफा सब पुकारो बे-करारो मरहबा या मुस्तफा, तुम भी कह दो परदा-दारो मरहबा या मुस्तफा कह दो रंज-ओ-ग़म के मारो मरहबा या मुस्तफा, आओ हिम्मत अब ना हारो मरहबा या मुस्तफा सब पुकारो दिलफ़गारो मरहबा या मुस्तफा, ऐ तीमो! बे-सहारा मरहबा या मुस्तफा कह दो ऐ सजदा-गुज़ारो मरहबा या मुस्तफा, तुम भी कह दो रोज़ा-दारो मरहबा या मुस्तफा कह दो ऐ फ़ुर्क़त के मारो मरहबा या मुस्तफा, सब पुकारो राज़-दारो मरहबा या मुस्तफा कह दो काबे के मीनारो मरहबा या मुस्तफा, सब्ज़ गुम्बद के नज़ारो मरहबा या मुस्तफा तुम भी कह दो खार-ज़ारो मरहबा या मुस्तफा, बाग़-ए-आलम की बहारो मरहबा या मुस्तफा सब पुकारो आबशारो मरहबा या मुस्तफा, वादियों और कोहसारो मरहबा या मुस्तफा तुम भी कह दो मुर्ग़-ज़ारो मरहबा या मुस्तफा, बाग़ के रंगीन नज़ारो मरहबा या मुस्तफा कह दो तुम भी चाँद-तारो मरहबा या मुस्तफा, पंछियों की उड़ती डारो मरहबा या मुस्तफा बोल उठो ऐ शीर-ख्वारो मरहबा या मुस्तफा, माह-पारो गुल-एज़ारो मरहबा या मुस्तफा क्यों नहीं कहते हो प्यारो मरहबा या मुस्तफा, कह भी दो नवाब-ओ-दारो मरहबा या मुस्तफा चलते चलते ही पुकारो मरहबा या मुस्तफा, ऐ पियादो और सवारो मरहबा या मुस्तफा सब पुकारो बदकारो मरहबा या मुस्तफा, ऐ जहां के ताजदारो मरहबा या मुस्तफा तुम भी कह दो रीग-ज़ारो मरहबा या मुस्तफा, महके फूलों और खारो मरहबा या मुस्तफा कह दो दरिया के किनारो मरहबा या मुस्तफा, बहर की ऐ तेज़-धारो मरहबा या मुस्तफा तुम भी कह दो शाख-ए-सारो मरहबा या मुस्तफा, ऐ पहाड़ों की क़तारो मरहबा या मुस्तफा धूम है अत्तार हर सू शाह के मीलाद की झूम कर तुम भी पुकारो मरहबा या मुस्तफा फ़रमान-ए-मुस्तफा सल्लल्लाहु तआला अलैहि व आलिही वसल्लम: मुझ पर दुरूद-ए-पाक की कसरत करो, बेशक यह तुम्हारे लिए तहारत है। (अबू याला ज ५ स ४५८ हदीस ६३८३)