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जो ख़्वाब में कभी आएँ हुज़ूर आँखों में

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

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जो ख़्वाब में कभी आएँ हुज़ूर आँखों में सरूर-ए-दिल में हो पैदा तो नूर आँखों में हटा दें आप अगर रुख़ से इक ज़रा पर्दा चमक न जाए अभी बरक़ी-ए-तूर आँखों में नज़र को हसरत-ए-पा-बोस है मेरे सरवर करम हुज़ूर करें पुर-नूर आँखों में खुले हैं दीदह-ए-उश्शाक़ क़ब्र में यूँ ही है इंतिज़ार-ए-किसी का ज़रूर आँखों में ख़ुदा है तो न ख़ुदा से जुदा है ऐ मौला तेरे ज़ुहूर से रब का ज़ुहूर आँखों में वजूद-ए-शम्स की बुरहान है ख़ुद वजूद इसका न माने कोई अगर है क़सूर आँखों में ख़ुदा से तुमको जुदा देखते हैं जो ज़ालिम है ज़ैग़-ए-क़ल्ब में उनके फ़ुत्तूर आँखों में न एक दिल के मह-ओ-मेहर-ओ-अंजुम-ओ-नरगिस है सब की आरज़ू रखें हुज़ूर आँखों में उमंड के आह नहीं आए अश्क-हाए ख़ूँ ये आ रहा है दिल-ए-नासबूर आँखों में हुज़ूर आँखों में आएँ हुज़ूर दिल में समाएँ हुज़ूर दिल में समाएँ हुज़ूर आँखों में गिलाफ़-ए-चश्म के उठते ही आसमान गए नज़र के ऐसे क़वी हैं तुयूर आँखों में नज़र नज़ीर न आया नज़र को कोई कहें बचे न ग़ुलाम-ए-नज़र में न हूर आँखों में हमारी जान से ज़्यादा क़रीब हों हम से तुम्हें क़रीब जो हमको है दूर आँखों में जहाँ की जान हैं वो जान से न कुछ मंज़ूर अयाँ है कफ़ की तरह यज़द-ओ-दूर आँखों में मय-ए-मोहब्बत से ये हैं सर-ए-सब्ज़ भरी हुई है शराब-ए-ज़ुहूर आँखों में हुआ है ख़ात्मा-ए-ईमान पर तेरा नूरी जबीं हैं ख़ुल्द-ओ-हूर-ओ-क़सूर आँखों में