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जो मदीने के तसव्वुर में जिया करते हैं

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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जो मदीने के तसव्वुर में जिया करते हैं हर जगह लुत्फ़-ए-मदीने का लिया करते हैं इश्क़-ए-सरवर में जो हस्ती को फ़ना करते हैं भेद-ए-उल्फ़त के फ़क़त उन पे खुला करते हैं माल-ओ-दौलत की दुआ हम न ख़ुदा करते हैं हम तो मरने की मदीने में दुआ करते हैं आग दोज़ख़ की जला ही नहीं सकती उन को इश्क़ की आग में दिल जिन के जला करते हैं दुर्र-ए-नायाब बिला शक हैं वो हीरे अनमोल अश्क आक़ा की जो यादों में बहा करते हैं दर्द-ओ-आलम में तस्कीन उन्हें मिलती है नाम उन का जो मुसीबत में लिया करते हैं तू सलाम उन से दर-ए-पाक पे जा कर कहना इल्तिजा तुझ से हम ऐ बाद-ए-सबा करते हैं क्यों फिरें शौक़ में हम माल के मारे मारे हम तो सरकार के टुकड़ों पे पला करते हैं सुन्नतों की वो बने रहते हैं हर दम तस्वीर जाम जो उन की मुहब्बत का पिया करते हैं सुन्नतों के ऐ मुबल्लिग़! हो मुबारक तुझ को तुझ से सरकार बड़ा प्यार किया करते हैं आप की गलियों के कुत्तों पे तसद्दुक़ जाऊं के मदीने के वो कूचों में फिरा करते हैं सुन लो! नुक़सान ही होता है बिल-आख़िर उन को नफ़्स के वास्ते ग़ुस्सा जो किया करते हैं बिल-यक़ीन ऐसे मुसलमान हैं बे-हद नादान जो कि रंगीनी-ए-दुनिया पे मरा करते हैं चाँद सूरज का मुक़द्दर भी तो देखो अक्सर गुम्बद-ए-ख़ज़रा के नज़ारे किया करते हैं झिलमिलाते हुए तारों की भी क़िस्मत है ख़ूब गुम्बद-ए-ख़ज़रा के नज़ारे किया करते हैं मस्जिद-ए-नबवी के पुर-नूर मीनारे हर दम गुम्बद-ए-ख़ज़रा के नज़ारे किया करते हैं झूम कर आते हैं बारिश लिए बादल जब भी गुम्बद-ए-ख़ज़रा के नज़ारे किया करते हैं बा-मुक़द्दर हैं मदीने के कबूतर बे-शक गुम्बद-ए-ख़ज़रा के नज़ारे किया करते हैं रश्क-ए-अत्तार को उन ज़र्रों पे आता है जो उन के नअ़लैन के तल्लों से लगा करते हैं क़ाबिल-ए-रश्क हैं अत्तार वो क़िस्मत वाले दफ़्न जो मीठे मदीने में हुआ करते हैं