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करम जो आप का ऐ सय्यद-ए-अबरार हो जाए

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

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करम जो आप का ऐ सय्यद-ए-अबरार हो जाए तो हर बदकार बंदा दम में नेकोकार हो जाए जो मोमिन देखे तुम को महरम-ए-असरार हो जाए जो काफिर देख ले तुम को तो वो दीनदार हो जाए जो सर रख दे तुम्हारे क़दमों पे सरदार हो जाए जो तुम से सरकशी फेरे ज़लील-ओ-ख़्वार हो जाए जो हो जाए तुम्हारा उस पे हक़ का प्यार हो जाए बने अल्लाह वाला वो जो तेरा यार हो जाए अगर आए वो जान-ए-नूर मेरे ख़ाना-ए-दिल में मह-ओ-ख़ावर मेरा घर मतला-ए-अनवार हो जाए ग़म-ओ-रंज-ओ-अलम और सब बलाओं का मदावा हो अगर वो गेसुओं वाला मेरा दिलदार हो जाए इनायत से मेरे सर पर अगर वो कफ़्श-ए-पा रख दें ये बंदा ताज़दारों का भी तो सरदार हो जाए तलातुम कैसा ही कुछ है मगर ऐ नाख़ुदा-ए-मन इशारा आप फ़रमा दें तो बेड़ा पार हो जाए जो डूबा चाहता है वो तो डूबा हुआ बेड़ा इशारा आप का पाए तो मौला पार हो जाए तुम्हारे फ़ैज़ से लाठी मिसाल-ए-शमा रौशन हो जो तुम लकड़ी को चाहो तेज़-तर तलवार हो जाए गुनाह कितने ही कैसे ही हैं पर रहमत-ए-आलम शफ़ाअत आप फ़रमाएं तो बेड़ा पार हो जाए भरम रह जाए महशर में न पल्ला हल्का हो अपना इलाही मेरे पल्ले पर मेरा ग़म-ख़्वार हो जाए इशारा पाए तो डूबा हुआ सूरज बरामद हो उठे उंगली तो मह-ए-दो बल्कि दो दो चार हो जाए तेरा तस्दीक़ करने वाला है अल्लाह का मोमिन तेरा मुनकिर वो जिस को हक़ से ही इंकार हो जाए मेरे साक़ी मय-ए-बाक़ी पिला दे एक आलम को जो बाक़ी और प्यासा है तेरा मय-ख़्वार हो जाए तुम्हारे हुक्म का बांधा हुआ सूरज फिरे उलटा जो तुम चाहो कि शब दिन हो अभी सरकार हो जाए तवाना और मज़ामीन अच्छे अच्छे हैं अभी बाक़ी मगर बस भी करो नूरी न पढ़ना बार हो जाए