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Khak-e-Madina Hoti Main Khaksar Hota

Written by Mufti Ahmad Yar Khan Naeemi

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ख़ाक-ए-मदीना होती मैं ख़ाकसार होता होती रह-ए-मदीना मेरा ग़ुबार होता आक़ा अगर करम से तैयबा मुझे बुलाते रौज़ा पे सदक़ा होता उन पर निसार होता वो बेकसों के आक़ा बे-कस को गर बुलाते क्यों सब की ठोकरों पर पड़ कर वो ख़्वार होता तैयबा में गर मयस्सर दो गज़ ज़मीन होती उन के क़रीब बसता दिल को क़रार होता मर मिट के ख़ूब लगती मिट्टी मेरी ठिकाने गर उन की रह-गुज़र पर मेरा मज़ार होता यह आरज़ू है दिल की होता वह सब्ज़ गुम्बद और मैं गुबार बन कर उस पर निसार होता बेचैन दिल को अब तक समझा बुझा के रखा मगर अब तो उस से आक़ा नहीं इंतज़ार होता सालक हुए हम उन के वह भी हुए हमारे दिल-ए-मुज़तरिब को लेकिन नहीं ऐतबार होता