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Khula mere dil ki kali Ghaus-e-Azam

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

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खुला मेरे दिल की कली गौस-ए-आज़म मिटा क़ल्ब की बे-कली गौस-ए-आज़म मेरे चांद में सदक़े आ जा इधर भी चमक उठे दिल की गली गौस-ए-आज़म तेरे रब ने मालिक किया तेरे जद को तेरे घर से दुनिया पली गौस-ए-आज़म वो है कौन ऐसा नहीं जिस ने पाया तेरे दर पे दुनिया ढली गौस-ए-आज़म कहा जिस ने या गौस-ए-अगसनी तो दम में हर आई मुसीबत टली गौस-ए-आज़म नहीं कोई भी ऐसा फ़रियादी आक़ा ख़बर जिस की तुम ने न ली गौस-ए-आज़म मेरी रोज़ी मुझ को अता कर दे आक़ा तेरे दर से दुनिया ने ली गौस-ए-आज़म न मांगूं मैं तुम से तो फिर किस से मांगूं कहीं और भी है चली गौस-ए-आज़म सदा गर यहां मैं न दूं तो कहां दूं कोई और भी है गली गौस-ए-आज़म जो क़िस्मत हो मेरी बुरी अच्छी कर दे जो आदत हो बद कर भली गौस-ए-आज़म तेरा मर्तबा आला क्यों हो न मौला तू है इब्न-ए-मौला अली गौस-ए-आज़म क़दम गर्दन-ए-औलिया पर है तेरा है तू रब का ऐसा वली गौस-ए-आज़म जो डूबी थी कश्ती वो दम में निकाली तुझे ऐसी क़ुदरत मिली गौस-ए-आज़म हमारा भी बेड़ा लगा दो किनारे तुम्हें नाख़ुदाई मिली ग़ौस-ए-आज़म तबाही से नाव हमारी बचा दो हवा-ए-मुखालिफ़ चली ग़ौस-ए-आज़म तुझे तेरे जद्द से उन्हें तेरे रब से है इल्म-ए-ख़फ़ी-ओ-जली ग़ौस-ए-आज़म मेरा हाल तुझ पर है ज़ाहिर कि पुतली तेरी लोह से जा मिली ग़ौस-ए-आज़म ख़ुदा ही के जलवे नज़र आए जब भी तेरी चश्म-ए-हक़ बीं खुली ग़ौस-ए-आज़म फ़िदा तुम पे हो जाए नूरी मुज़्तर यह है उस की ख़्वाहिश-ए-दिली ग़ौस-ए-आज़म