Home/Mustafa Raza Khan Qadri/Kuch Aisa Kar De Mere Kirdagar Aankhon Mein

Kuch Aisa Kar De Mere Kirdagar Aankhon Mein

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

100%
कुछ ऐसा कर दे मेरे किरदार आँखों में हमेशा नक़्श रहे रूए यार आँखों में ना कैसे ये गुल ओ ग़ुंचे हों ख़्वार आँखों में लबे हुए हैं मदीने के ख़ार आँखों में बसा हुआ है कोई गुल ए इज़ार आँखों में खुला है चार तरफ लाला ज़ार आँखों में हवा है जलवा नुमा गुल ए इज़ार आँखों में ख़िज़ाँ के दौर में फूली बहार आँखों में सरूर ओ नूर हो दिल में बहार आँखों में जो ख़्वाब में कभी आये निगार आँखों में वो नूर दे मेरे परवरदिगार आँखों में के जलवा गर रहे रुख की बहार आँखों में नज़र हो क़दमों पर उनके निसार आँखों में बनाएं अपना हो वो रह गुज़ार आँखों में ना एक निगाह ही सदक़ा हो दिल भी क़ुर्बाँ हो करम करे तो वो नाक़ा सवार आँखों में बसर के साथ बसीरत भी ख़ूब रौशन हो लगाऊं ख़ाके क़दम बार बार आँखों में तुम्हारे क़दमों पे मोती निसार होने को हैं बेशुमार मेरी अश्कबार आँखों में नज़र ना आया क़रार ए दिल ए हज़ीन अब तक निगाह रहती है यूँ बेक़रार आँखों में उन्हें ना देखा तो किस काम की हैं ये आँखें के देखने की है सारी बहार आँखों में नज़र में कैसे समाएंगे फूल जन्नत के के बस चुके हैं मदीने के ख़ार आँखों में अजब नहीं के लिखा लौह का नज़र आये जो नक़्श ए पा का लगाऊं ग़ुबार आँखों में मिले जो ख़ाके क़दम उनकी मुझको क़िस्मत से लगाऊं सुरमा ना फिर ज़ीनहार आँखों में मदीना जाने चमन और ख़िज़ाँ से ऐमन है लगाये ख़ाक वहाँ की हज़ार आँखों में खुले हैं दीदए उश्शाक़ ख़्वाब ए मर्ग में भी के उस निगार का है इंतिज़ार आँखों में ख़िज़ाँ का दौर हुआ दूर वो जहाँ आये हुई है क़दमों से उनके बहार आँखों में ये इश्तियाक़ ए तरी दीद का है जाने जहाँ दम आ गया है दम ए एहतिज़ार आँखों में ये आसमान के तारे ये नरगिस ए शहला तेरा ही जलवा है इन बेशुमार आँखों में यह दम हमारा कोई दम का और मेहमान है करम से लीजिये दम भर करार आँखों में वह सब्ज़ सब्ज़ नज़र आ रहा है गुम्बद-ए-सब्ज़ करार आ गया यूँ बे-करार आँखों में बहार-ए-दुनिया है फ़ानी न कर इस पर है कोई दम की यह सारी बहार आँखों में यह गुल यह ग़ुंचे यह गुलशन के बेल और बूटे उन्हीं के दम की है सारी बहार आँखों में यह हाल-ए-ज़ार है फ़ुरक़त में तेरे मुज़्तर का के अश्क आते हैं बे-इख़्तियार आँखों में वही मुझे नज़र आएं जिधर निगाह करूँ उन्हीं का जलवा रहे आश्कार आँखों में यह दिल तड़प के कहीं आँखों में न आ जाए के फिर रहा है किसी का मज़ार आँखों में न ऐसे फूल खुले हैं कभी न आगे खिलें बाहारों में है अरब की बहार आँखों में क़रीब है रग-ए-गर्दन से पर जुदा है वह न यार दिल में कहीं है न यार आँखों में यह क़ुर्ब और यह दूरी ख़ुदा की क़ुदरत है के होगा ख़ुल्द में दीदार-ए-यार आँखों में करम यह मुझ पे किया है मेरे तसव्वुर ने के आज खींच दी तस्वीर-ए-यार आँखों में फ़रिश्तो पूछते हो मुझ से किस की उम्मत हो लो देख लो यह है तस्वीर-ए-यार आँखों में न सिर्फ़ आँखें ही रौशन हों दिल भी बीना हो अगर वह आएं कभी एक बार आँखों में हज़ार आँखें हैं तारों की एक गुल-ए-महताब यह एक फूल है जैसे हज़ार आँखों में यूँ ही हैं माह-ए-रिसालत भी सब नबियों में करोड़ आँखों नहीं बे-शुमार आँखों में यह क्या सवाल है मुझ से के किस का बंदा है मैं जिस का बंदा हूँ है नूर बार आँखों में है आश्कार नज़र में जहां की नैरंगी जमा है नक़्शा-ए-लैल-ओ-नहार आँखों में जमा हुआ है तसव्वुर में रौज़ा-ए-वाला लबे हुए हैं वह लैल-ओ-नहार आँखों में नहार चेहरा वाला तो गेसू हैं वल-लैल बहम हुए हैं यह लैल-ओ-नहार आँखों में पिया है जाम-ए-मोहब्बत जो आप ने नूरी हमेशा इस का रहे गा ख़ुमार आँखों में