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Kun Ka Hakim Kar Diya Allah Ne Sarkar Ko

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

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कुन का हाकिम कर दिया अल्लाह ने सरकार को काम शाखों से लिया है आप ने तलवार का कुछ अरब पर ही नहीं मौक़ूफ़ ऐ शाह-ए-जहाँ लोहा माना एक आलम ने तेरी तलवार का काट कर यह ख़ुद सर में घुस के भेजा चाट ले काट ऐसा है तुम्हारी काठ की तलवार का इस किनारे हम खड़े हैं पाट ऐसा धार यह अल-मदद ऐ नाखुदा है क़िस्सा अपने पार का रब्बि सल्लिम की दुआ से पार बेड़ा कीजिये राह है तलवार पर नीचे है दरिया-ए-नार का तू है वह शीरीन दहन खारी कुएँ शीरीन हुए इन को काफ़ी हो गया आब-ए-दहन इक बार का जिस ने जो माँगा वह पाया और बे-माँगे दिया पाक मुँह पर हर्फ़ आया ही नहीं इनकार का दिल में घर करता है आदा के तेरा शीरीन सुख़न है मेरे शीरीन सुख़न शोहरा तेरी गुफ़्तार का ज़ुल्मत-ए-मरक़द का अंदेशा हो क्यों नूरी मुझे क़ल्ब में है जब मेरे जलवा-ए-जमाल-ए-यार का