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लिख रहा हूँ नात-ए-सरवर-ए-सब्ज़ गुंबद देख कर

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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लिख रहा हूँ नात-ए-सरवर-ए-सब्ज़ गुंबद देख कर कैफ़ तारी है क़लम पर सब्ज़ गुंबद देख कर है मुक़द्दर यावरी पर सब्ज़ गुंबद देख कर फिर न क्यों झूमे सना गर सब्ज़ गुंबद देख कर मस्जिद-ए-नबवी पे पहुँचे मरहबा सल्ल-ए-अला हो गया जारी ज़बाँ पर सब्ज़ गुंबद देख कर जूँ ही मैं पहुँचा मदीने की गली में बेक़रार आँख मेरी हो गई तर सब्ज़ गुंबद देख कर रूह को तस्कीन-ए-जाँ मुज़तरिब को चैन है दिल को भी राहत मयस्सर सब्ज़ गुंबद देख कर उनके माँगते, उनके साइल दो जहाँ की नेअमतें माँगते हैं हाथ उठा कर सब्ज़ गुंबद देख कर आप से बस आप ही को माँगता है या नबी! आप का अदना गदागर सब्ज़ गुंबद देख कर लंदन व पेरिस का आशिक़ भी यक़ीनन मरहबा! बोल उठेगा रूह-ए-परवर सब्ज़ गुंबद देख कर धूप रोज़ाना मदीना झूम कर है चूमती और लिपट जाती है आकर सब्ज़ गुंबद देख कर चूम लेता है मदीना रोज़ आकर आफ़ताब फिर लिपट जाता है आकर सब्ज़ गुंबद देख कर टूट जाए दम मदीने में मेरा या रब! बक़ीअ काश हो जाए मयस्सर सब्ज़ गुंबद देख कर जब जुदाई की घड़ी आती है तो कोह-ए-अलम टूट पड़ता है दिलों पर सब्ज़ गुंबद देख कर आप की गलियों के कुत्ते मुझ से अच्छे रहे है सुकूँ उन को मुयस्सर सब्ज़ गुंबद देख कर वक़्त-ए-रुख़सत ख़ून उगलते थे मेरे क़ल्ब-ओ-जिगर आँख रो पड़ती थी अक्सर सब्ज़ गुंबद देख कर मेरे मुरशद ने गुज़ारे हैं मदीने में बरस उन की रहमत से पच्चहत्तर सब्ज़ गुंबद देख कर या रसूल अल्लाह! मुरशद पर करम हों बेशुमार सोए हैं क़दमों में आकर सब्ज़ गुंबद देख कर आह! ऐ अत्तार इतना भी न तुझ से हो सका! जान कर देता निछावर सब्ज़ गुंबद देख कर