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Maah-e-Rabi-ul-Awwal Aaya

Written by Mufti Ahmad Yar Khan Naeemi

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माह-ए-रबी-उल-अव्वल आया रब की रहमत साथ में लाया वक़्त-ए-मुबारक रात सुहानी सुबह का तड़का है नूरानी पीर का दिन तारीख़ है बारह फ़र्श पे चमका अर्शी तारा आज की रात बरात रची है आमना के घर धूम मची है घर में हूरें दर पे मलक हैं जिन की क़तारें ता-ब-फ़लक हैं ठंडी हवा का झोंका आया शोर मचा एक सल्ल-ए-अला का लो वो उठी गर्द-ए-सवारी पैदा हुए महबूब-ए-बारी बाग़-ए-ख़लील का वो गुल-ए-ज़ेबा कश्त-ए-सफ़ी का नख़्ल-ए-तमन्ना रहमत-ए-आलम नूर-ए-मुजस्सम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम तुम भी उठो अब वक़्त-ए-अदब है ज़िक्र-ए-विलादत-ए-शाह-ए-अरब है तख़्त है उन का ताज है उन का दोनों जहान में राज है उन का जिन-ओ-मलक हैं उन के सिपाही रब की खुदाई में उन की शाही ऊँचे ऊँचे यहाँ झुकते हैं सारे इन्हीं का मुँह तकते हैं शाह-ओ-गदा हैं उन के सलामी फ़ख़्र है सब को उन की ग़ुलामी काबा की ज़ीनत इन्हीं के दम से तैबा की रौनक़ उन के क़दम से काबा ही क्या है सारे जहाँ में धूम है उन की कौन ओ मकाँ में आमिना बी को लअल मुबारक दाई हलीमा को बाल मुबारक तुम को खलील अल्लाह मुबारक तुम को ज़बीह अल्लाह मुबारक दान करो कुछ जश्न है भारी दर पे खड़े हैं सारे भिखारी दर पे हैं हाज़िर अपने पराये आप के दम से आस लगाये हम तो पुराने कमीन हैं दर के नाम लिखे हैं पिदर मादर के चश्म-ए-करम लिल्लाह इधर हो सालिक्-ए-ख़स्ता पर भी नज़र हो