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Madine ki taraf phir kab rawana qafila ho ga

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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मदीने की तरफ फिर कब रवाना क़ाफ़िला हो गा मुझे इज़्न-ए-मदीना कब मरे आक़ा अता हो गा यक़ीनन रोज़-ए-महशर सिर्फ़ उसी से ख़ुश ख़ुदा हो गा यहां दुनिया में जिस ने मुस्तफ़ा को ख़ुश किया हो गा वही सर बर सर-ए-महशर बुलंदी पाए गा जो सर यहां दुनिया में उन के आस्ताने पर झुका हो गा कोई हफ़्ता न कोई दिन कोई घंटा तो क्या अफ़सोस कोई लम्हा भी इस्यां से नहीं ख़ाली गया हो गा नहीं जाती गुनाहों की शहा! आदत नहीं जाती करम मौला पस-ए-मुर्दन न जाने मेरा क्या हो गा फ़क़त नेकों पे हो गा गर करम ऐ सरवर-ए-आलम! कहां जाए गा वह बंदा जो बद हो गा बुरा हो गा तेरे रहम-ओ-करम पर आस मैं ने बांध रखी है बड़ी उम्मीद है आका! करम रोज़-ए-जज़ा होगा नबी के आशिक़ों को मौत तो अनमोल तोहफ़ा है के उन को क़ब्र में दीदार-ए-शाह-ए-अंबिया होगा अंधेरी गोर है तन्हा हूँ मुझ पर ख़ौफ़ तारी है तुम आओगे तो आका दूर अंधेरा क़ब्र का होगा फ़रिश्ते क़ब्र में पूछेंगे जब मुझ से सुवाल आकर मेरे लब पर तराना इन शा अल्लाह नात का होगा नबी के आशिक़ों की ईद होगी ईद-ए-महशर में कोई क़दमों में होगा कोई सीने से लगा होगा तेरे दामन-ए-रहमत की खुलेगी हश्र में वुसअत वो आ आकर छुपेगा जो गुनाहगार और बुरा होगा तसल्ली रख तसल्ली रख न घबरा हश्र से अत्तार तेरा हामी वहां पर आमना का लाड़ला होगा न घबरा मौत से अत्तार बरज़ख़ में तू मिल लेना वहां ग़ौस-उल-वरा होगा वहां अहमद रज़ा होगा