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मैं जो यूं मदीने जाता तो कुछ और बात होती

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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मैं जो यूं मदीने जाता तो कुछ और बात होती कभी लौट कर न आता तो कुछ और बात होती मैं मदीने तो गया था यह बड़ा शरफ़ था लेकिन वहीं दम जो टूट जाता तो कुछ और बात होती ग़म-ए-रोज़गार में तो मरे अश्क बह रहे हैं तिरा ग़म अगर रुलाता तो कुछ और बात होती न फ़ुज़ूल काश! हंसता तिरी याद में तड़पता मुझे चैन ही न आता तो कुछ और बात होती यही आह! फ़िक्र-ए-दुनिया मिरा दिल जला रही है ग़म-ए-हिज्र गर सताता तो कुछ और बात होती यहां क़ब्र में करम से तिरी दीद मुझ को होगी जो बक़ी-ए-पाक पाता तो कुछ और बात होती बज़बान-ए-ज़ाइरीन तो मैं सलाम भेजता हूं कभी ख़ुद सलाम लाता तो कुछ और बात होती अरे ज़ाइर-ए-मदीना! तू ख़ुशी से हंस रहा है दिल-ए-ग़मज़दा जो लाता तो कुछ और बात होती मरी आंख जब भी खुलती तिरी रहमतों से आक़ा तुझे सामने ही पाता तो कुछ और बात होती तू मदीना छोड़ आया तुझे क्या हुआ था अत्तार वहीं घर अगर बसाता तो कुछ और बात होती