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Mera ghar ghairat-e-khursheed-e-darakhshan hoga

Written by Mustafa Raza Khan Qadri

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मेरा घर ग़ैरत-ए-ख़ुर्शीद-ए-दरख़्शां होगा ख़ैर से जान-ए-क़मर जब कभी मेहमान होगा जो तबस्सुम से अयां एक दुर-ए-दंदां होगा ज़र्रा ज़र्रा मेरे घर का मह-ए-ताबاں होगा क्यों मुझे ख़ौफ़ हो महशर का कि हाथों में मेरे दामन-ए-हामी-ए-ख़ुद माही-ए-इसयां होगा पल्ला-ए-इसयां का गिरां भी हो तो क्या ख़ौफ़ मुझे मेरे पल्ले पे तो वो रहमत-ए-रहमां होगा मुझ से आसी को जो बे-दाग़ छुड़ा लाएंगे अहल-ए-महशर में जो देखेगा वो हैरां होगा कोई मुँह मेरा तक़ेगा कि ये आसी है जिस को हम जानते थे दाख़िल-ए-मीज़ां होगा कोई उस रहमत-ए-आलम पे तसद्दुक़ होगा कोई ये शान-ए-करम देख के क़ुरबां होगा माजरा देख के होगा ये किसी को सक़्ता एक तअज्जुब से वो अंगुश्त-ए-ब-दंदां होगा उन की हैरत पे कहूँगा कि तअज्जुब क्या है ख़ुद ख़ुदा होगा जिधर सरवर-ए-ज़ीशां होगा दम निकल जाए तुम्हें देख के आसानी से कुछ भी दुश्वार न होगा जो ये आसां होगा ज़ख़्म पर ज़ख़्म यही खाए यही क़त्ल भी हो ख़ून-ए-मुस्लिम अभी क्या इस से भी अरज़ां होगा भेड़ियों का है ये जंगल नहीं कोई राई भोली भेड़ों का शहा कौन निगहबां होगा ज़ुल्म पर ज़ुल्म सहे और सज़ाएं भुगते और उफ़ की न ख़ंजर-ए-बुरां होगा यही अंधेरा अगर और भी कुछ रोज़ रहा तो मुसलमां का निशां भी न नुमायां होगा सुब्ह-ए-रौशन की सियह बख़्ती से अब शाम हुई कब क़मर नूर-ए-देह-ए-शाम-ए-ग़रीबां होगा तू अगर चाहे मिले ख़ाक में सुल्तान-ए-ज़मां तेरा बंदा कोई तो चाहे तो सुल्तान होगा ज़ुल्मत-ए-क़ब्र का क्या ख़ौफ़ मुझे ऐ नूरी जब मरे क़ल्ब में ईमां का लुमआं होगा