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Mil gayi kaisi saadat mil gayi

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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मिल गई कैसी सआदत मिल गई मुझ को अब हज्ज की इजाज़त मिल गई फिर मदीने का सफ़र दरपेश है फिर मदीने की इजाज़त मिल गई मेरे मदनी पीर-ओ-मुर्शद के तुफ़ैल फिर मदीने की इजाज़त मिल गई क्यों न झूमूं क्यों न लूटूं मुझ को तो फिर मदीने की इजाज़त मिल गई मैं ख़ुशी से मर न जाऊं अब कहीं फिर मदीने की इजाज़त मिल गई दे दे या रब! मुझ को तौफ़ीक़-ए-अदब फिर मदीने की इजाज़त मिल गई रोने वाली आँख दे दे या ख़ुदा! फिर मदीने की इजाज़त मिल गई या इलाही क़ल्ब-ए-मुज़्तर हो अता फिर मदीने की इजाज़त मिल गई अब तो दे दे या ख़ुदा ज़ौक़-ए-जुनूं फिर मदीने की इजाज़त मिल गई या ख़ुदा दे दे तड़पने की अदा फिर मदीने की इजाज़त मिल गई आतिश-ए-शौक़ और कर दे तेज़ तर फिर मदीने की इजाज़त मिल गई हो अता सोज़-ए-बिलाल ऐ ज़ुलजलाल फिर मदीने की इजाज़त मिल गई उन के जलवे देख ले वो आँख दे फिर मदीने की इजाज़त मिल गई या इलाही! तू अता कर दे बक़ी फिर मदीने की इजाज़त मिल गई मिल गया जिस को बक़ी-ए-पाक उसे क़ुर्बत-ए-माह-ए-रिसालत मिल गई झूमो झूमो ख़ूब झूमो ज़ाइरो! क्या मिला दर-ए-उन का जन्नत मिल गई क़ब्र-ए-अनवर की ज़ियारत जिस ने की उस को आक़ा की शफ़ाअत मिल गई अर्श पर तो गुम्बद-ए-ख़ज़रा कहाँ! फ़र्श तुझ को ये सआदत मिल गई रो रहे हैं आशिकान-ए-मुस्तफ़ा वाह वाह क्या ख़ूब क़िस्मत मिल गई ग़म-ए-मदीने का जिसे भी मिल गया दो जहान की उस को नेमत मिल गई ताज-ए-शाही उस के आगे हीच है मुस्तफ़ा की जिस को उल्फ़त मिल गई हम को फ़ैज़ान-ए-मदीना मिल गया कैसी आला हम को नेमत मिल गई मैं मदीने में मरूँ इस हाल में सब कहें इस को शहादत मिल गई "अल-मदीना" चल मदीना झूम कर जब पुकारा दिल को राहत मिल गई जब तड़प कर या रसूल अल्लाह कहा फ़ौरन आक़ा की हिमायत मिल गई अम्बिया सारे खड़े हैं सफ़-ब-सफ़ मेरे आक़ा को इमामत मिल गई ख़ाक-ए-तैयबा से क्या जिस ने इलाज हर मर्ज़ से उस को राहत मिल गई मेरी क़िस्मत की यही मेराज है उन के कफ़श-ए-पा से निस्बत मिल गई दोनों आलम में हुआ वो सुर्ख़रू जिस को उन की चश्म-ए-रहमत मिल गई मैं इमाम-ए-अहमद-ए-रज़ा का हूँ ग़ुलाम कितनी आला मुझ को निस्बत मिल गई राह-ए-सुन्नत में हुआ जो भी ज़लील उस को उन के दर से इज़्ज़त मिल गई थे गुनाह हद से सिवा अत्तार के उन के सदक़े फिर भी जन्नत मिल गई क्यों न रश्क आए हमें अत्तार पर उस को तैयबा की इजाज़त मिल गई