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Momin hoon mominoon pe raoof-ur-raheem hoon

Written by Imam Ahmad Raza Khan Qadri

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मोमिन हूँ मोमिनों पे रऊफ़-उर-रहीम हूँ साएल हूँ साएलों को ख़ुशी ला-तन्हर की है दामन का वास्ता मुझे उस धूप से बचा मुझ को शाक़ जाड़ों में इस दोपहर की है माँ दोनों भाई बेटे भतीजे अज़ीज़ दोस्त सब तुझ को सौंपे मुल्क ही सब तेरे घर की है जिन जिन मुरादों के लिए अहबाब ने कहा पेश-ए-ख़बीर क्या मुझे हाजत ख़बर की है फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा से ग़ैब शहादत हुआ उन्हें इस पर शहादत आयत-ओ-वही-ओ-असर की है कहना ना कहने वाले थे जब से तो इत्तला मौला को क़ौल-ओ-क़ाइल-ओ-हर ख़ुश्क-ओ-तर की है उन पर किताब उतरी बयानन-लि-कुल्ली-शई तफ़सील जिस में मा-ग़बरा-ओ-मा-ग़बर की है आगे रही अता वो ब-क़द्र-ए-तलब तो क्या आदत यहाँ उम्मीद से भी बेशतर की है बे-मांगे देने वाले की नेमत में ग़र्क़ हैं मांगे से जो मिले किसे फ़हम इस क़द्र की है अहबाब इस से बढ़ के तो शायद न पाएँ अर्ज़ नाकर्दा अर्ज़ अर्ज़-ए-ये तर्ज़-ए-दिगर की है दंदाँ का नात-ख्वाँ हूँ न पायाब होगी आब नदी गले गले मेरे आब-ए-गौहर की है दश्त-ए-हरम में रहने दे सय्याद अगर तुझे मिट्टी अज़ीज़ बुलबुल-ए-बे-बाल-ओ-पर की है या रब रज़ा न अहमद-ए-पारीना हो के जाए ये बारगाह तेरे हबीब-ए-अबरार की है तौफ़ीक़ दे कि आगे न पैदा हो खू-ए-बद तब्दील कर जो ख़सलत-ए-बद पेशतर की है आ कुछ सुना दे इश्क़ के बोलों में ऐ रज़ा मुश्ताक़ तब्अ लज़्ज़त-ए-सोज़-ए-जिगर की है