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Muaf Fazl-o-Karam Se Ho Har Khata Ya Rab

Written by Muhammad Ilyas Attar Qadri

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मुआफ़ फ़ज़्ल-ओ-करम से हो हर ख़ता या रब हो मग़फ़िरत पये सुल्तान-ए-अम्बिया या रब बिला हिसाब हो जन्नत में दाख़िला या रब पड़ोस ख़ुल्द में सरवर का हो अता या रब नबी का सदक़ा सदा के लिये तू राज़ी हो कभी भी होना न नाराज़ या ख़ुदा या रब तेरे हबीब अगर मुस्कराते आ जायें तो बिलयक़ीन उठे क़ब्र जगमगा या रब ख़ुवां फ़टक न सके पास, दे बहार ऐसी रहे हयात का गुलशन हरा भरा या रब हमारे दिल से निकल जाये उल्फ़त-ए-दुनिया दे दिल में इश्क़-ए-मुहम्मद मेरे रचा या रब नबी की दीद है ईद या अल्लाह अता हो ख्वाब में दीदार-ए-मुस्तफ़ा या रब! तेरे हबीब की सुन्नत की धूम मच जाए गली गली में फिरे "मदनी क़ाफ़िला" या रब! मेरी ज़बान पे "क़ुफ़्ल-ए-मदीना" लग जाए फ़ुज़ूल गोई से बचता रहूं सदा या रब उठे न आँख कभी भी गुनाह की जानिब अता करम से हो ऐसी मुझे हया या रब किसी की खामियां देखें न मेरी आँखें और सुनें न कान भी ऐबों का तज़किरा या रब टलें न हश्र में अत्तार के अमल मौला बिला हिसाब ही तू उसको बख्शना या रब