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मुबारक हो वो शह परदे से बाहर आने वाला है

Written by Allama Hasan Raza Khan

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मुबारक हो वो शह परदे से बाहर आने वाला है गदाई को ज़माना जिस के दर पर आने वाला है चकोरों से कहो माह-ए-दिल-आरा है चमकने को ख़बर ज़र्रों को दो मेहर-ए-मुनव्वर आने वाला है फ़क़ीरों से कहो हाज़िर हों जो मांगेंगे पाएंगे के सुल्तान-ए-जहाँ मोहताज परवर आने वाला है कहो परवानों से शम-ए-हिदायत अब चमकती है ख़बर दो बुलबुलों को वो गुल-ए-तर आने वाला है कहाँ हैं टूटी उम्मीदें कहाँ हैं बे सहारे दिल के वो फ़रियाद रस बे-कस का यावर आने वाला है ठिकाना बे-ठिकानों का सहारा बे-सहारा का ग़रीबों की मदद बे-कस का यावर आने वाला है बर आएंगी मुरादें हो जाएंगी पूरी के वो मुख़्तार-ए-कुल आलम का सरवर आने वाला है मुबारक दर्द मंदों को हो मुज़दा बेक़रारों को क़रार-ए-दिल, शकीब-ए-जान, मुज़्तर आने वाला है गुनाहगारो न मायूस तुम अपनी रिहाई से मदद को वह शफ़ी-ए-रोज़-ए-महशर आने वाला है तुझ को लाए न क्यों तारों को शौक़-ए-जल्वा-ए-आरिज़ कि वह माह-ए-दिल-आरा अब ज़मीन पर आने वाला है कहाँ हैं बादशाहान-ए-जहाँ आएँ सलामी को कि अब फ़रमाँ-रवा-ए-हफ़्त-किश्वर आने वाला है सलातीन-ए-ज़माना जिस के दर पर भीक माँगेंगे फ़क़ीरों को मुबारक वह तवंगरी आने वाला है ये सामाँ हो रहे थे मुद्दतों से जिस की आमद के वही नौशाह-ए-बा-सद-शौकत-ओ-फ़र आने वाला है वह आता है कि है जिस का फ़िदाई आलम-ए-बाला वह आता है कि दिल आलम का जिस पर आने वाला है न क्यों ज़रों को हो फ़रहत कि चमका अख़्तर-ए-क़िस्मत सहर होती है ख़ुर्शीद-ए-मुनव्वर आने वाला है हसन कह दे उठें सब उमती तअज़ीम की ख़ातिर कि अपना पेशवा अपना पयम्बर आने वाला है