मुद्दत से मेरे दिल में है अरमान-ए-मदीना, रौज़े पे बुला लीजिये सुल्तान-ए-मदीना
ऐ काश! पहुँच के दर-ए-जानान-ए-मदीना, हो जाऊं मैं सौ जान से क़ुर्बान-ए-मदीना
आते हैं मुक़द्दर के सिकन्दर तेरे दर पर, बे-इज़्न हो कैसे कोई मेहमान-ए-मदीना
आग ऐसी लगा दीजिये क़ल्ब-ओ-जिगर में, रोता रहूँ तड़पा करूँ ऐ जान-ए-मदीना
गुलज़ार यहाँ के इसे अच्छे नहीं लगते, आँखों में समाये हैं बियाबान-ए-मदीना
अब सिन्ध के जंगल में मेरा जी नहीं लगता, बस मुझ को बुला लीजिये गुलिस्तान-ए-मदीना
दुनिया के नज़ारे हमें एक आँख न भायें, नज़रों में बसें काश! बियाबान-ए-मदीना
लण्डन कोई जापान चला माल कमाने, दीवाना चला सोये बियाबान-ए-मदीना
दुनिया का कोई शहर हो किस तरह मुमासिल? जब ख़ुल्द-ए-बरीं भी नहीं हम-शान-ए-मदीना
कर दीजिये दीदार से आँखें मेरी ठण्डी, ऐ जान-ए-जहाँ सय्यद-ओ-सुल्तान-ए-मदीना
ऐ काश! मुबल्लिग़ मैं बनूँ दीन-ए-मुबीं का, सरकार! करम अज़ पये हस्सान-ए-मदीना
क़दमों में बुला लीजिये बदकार को आक़ा, और इस को बना लीजिये मेहमान-ए-मदीना
अत्तार को दौलत न हुकूमत की तलब है, दीदे बक़ीअ इस को तो सुल्तान-ए-मदीना